भारत की अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यवस्था में केवल अधिक धन खर्च करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि यह धन वास्तव में कहाँ, किस संस्था, किस शोधकर्ता और किस परियोजना पर खर्च हो रहा है। हाल ही में नीति आयोग (NITI Aayog) की ‘Ease of Doing Research and Development in India’ रिपोर्ट ने भारत के R&D पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी कई महत्वपूर्ण समस्याओं को उजागर किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, Anusandhan National Research Foundation (ANRF) के अंतर्गत उपलब्ध फंडिंग का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा IITs में केंद्रित है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ANRF का उद्देश्य भारत में शोध के लिए व्यापक आधार तैयार करना और केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों के बजाय विश्वविद्यालयों तथा विभिन्न शोध संस्थानों को भी पर्याप्त सहायता प्रदान करना है। रिपोर्ट के साथ किए गए सर्वेक्षण में 400 से अधिक संस्थागत नेताओं और लगभग 850 वैज्ञानिकों के विचार भी शामिल किए गए।
भारत की एक अन्य बड़ी समस्या यह है कि कई केंद्रीय सरकारी एजेंसियाँ समान या मिलते-जुलते शोध क्षेत्रों में अलग-अलग परियोजनाओं को फंड कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन के दोहराव या funding overlap की संभावना बढ़ जाती है। वर्तमान में विभिन्न सरकारी विभागों और शोध-वित्तपोषण एजेंसियों के पास अपने-अपने अलग डेटाबेस हैं। इन डेटाबेस में जानकारी अलग-अलग प्रारूपों में दर्ज होती है और अक्सर शोधकर्ता या संस्थान के नाम भी अलग तरीके से लिखे जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक रिकॉर्ड में किसी संस्था का नाम “IISc, Bangalore” और दूसरे में “Indian Institute of Science, Bengaluru” हो सकता है। इसी प्रकार किसी शोधकर्ता का नाम अलग-अलग डेटाबेस में अलग रूप में दर्ज होने पर कंप्यूटर सिस्टम यह पहचानने में असफल हो सकता है कि दोनों रिकॉर्ड एक ही व्यक्ति के हैं। हजारों शोध परियोजनाओं और हर वर्ष होने वाली बड़ी संख्या में फंडिंग के बीच ऐसी विसंगतियाँ भारत के R&D निवेश की वास्तविक तस्वीर को अस्पष्ट बना देती हैं।
नीति आयोग ने इस समस्या से निपटने के लिए Unified Project Management System (UPMS) का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की सार्वजनिक R&D परियोजनाओं के planning, funding, monitoring और evaluation को एकीकृत करना है। हालांकि, केवल एक नया पोर्टल या प्रबंधन प्रणाली बनाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए एक मजबूत Persistent Identifiers (PIDs) और Metadata Infrastructure की आवश्यकता होगी। सरल शब्दों में, प्रत्येक research grant को एक स्थायी और विशिष्ट डिजिटल पहचान संख्या दी जानी चाहिए। जिस प्रकार PAN किसी करदाता की पहचान करता है या IMEI किसी मोबाइल फोन की पहचान करता है, उसी प्रकार एक PID किसी विशेष research grant की पहचान कर सकता है। इस पहचान के साथ यह जानकारी भी जुड़ी होनी चाहिए कि पैसा किस सरकारी एजेंसी ने दिया, किस संस्था को दिया, किस शोधकर्ता को दिया गया, कितनी राशि दी गई, परियोजना कितने समय के लिए है और शोध किस क्षेत्र से संबंधित है। इस जानकारी को metadata कहा जाता है।
यदि किसी शोध परियोजना को एक विशिष्ट PID दिया जाता है और उसे उससे संबंधित शोधकर्ता, संस्था तथा funding agency से जोड़ दिया जाता है, तो उस परियोजना के परिणामों को भी आसानी से ट्रैक किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जब कोई वैज्ञानिक उस परियोजना के आधार पर research paper प्रकाशित करता है और उसमें grant identifier का उल्लेख करता है, तो यह पता लगाया जा सकता है कि वह शोध किस सार्वजनिक फंडिंग से विकसित हुआ। इसी प्रकार उस परियोजना से उत्पन्न patents, datasets और अन्य research outputs को भी संबंधित grant से जोड़ा जा सकता है। इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि सार्वजनिक धन से केवल शोध परियोजनाएँ शुरू हुईं या उनसे वास्तव में उपयोगी परिणाम भी प्राप्त हुए।
भारत को इस प्रकार की व्यवस्था पूरी तरह शून्य से विकसित करने की आवश्यकता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Crossref जैसी गैर-लाभकारी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था ने research funding को आपस में जोड़ने के लिए एक व्यवस्था विकसित की है। इसमें अलग-अलग प्रकार के persistent identifiers का उपयोग किया जाता है। Funder ID के माध्यम से उस एजेंसी की पहचान की जा सकती है जिसने शोध के लिए पैसा दिया है। Research Organization Registry (ROR) ID के माध्यम से उस संस्थान की पहचान की जाती है जिसे फंड मिला है। ORCID के माध्यम से व्यक्तिगत शोधकर्ता की विशिष्ट पहचान की जाती है। इसके अलावा Crossref ने Grant DOI की व्यवस्था भी विकसित की है, जो किसी research grant को स्थायी डिजिटल पहचान प्रदान करती है। इन सभी identifiers को metadata के साथ जोड़ने पर यह पता लगाना काफी आसान हो जाता है कि कौन-सी एजेंसी किस शोधकर्ता और संस्था को किस परियोजना के लिए कितना पैसा दे रही है।
ऐसी व्यवस्था से सरकार और स्वतंत्र शोध विश्लेषक कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह पता लगाया जा सकता है कि क्या कई सरकारी एजेंसियाँ एक जैसे research proposals को अलग-अलग फंड कर रही हैं, कौन-से research fields राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की तुलना में अत्यधिक फंडिंग प्राप्त कर रहे हैं और क्या कुल R&D funding का बहुत बड़ा हिस्सा कुछ ही संस्थानों या शोधकर्ताओं तक सीमित है। इससे funding concentration की समस्या को भी समझा जा सकता है। यदि किसी विशेष संस्था या शोधकर्ता को लगातार बहुत बड़ी मात्रा में सरकारी शोध फंड मिल रहा है, तो नीति-निर्माता इसकी समीक्षा कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि देश की R&D क्षमता व्यापक संस्थागत आधार पर विकसित हो।
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में किए गए एक अध्ययन में कई लाख federal grant applications का automated text-matching software की मदद से विश्लेषण किया गया था और अनुमान लगाया गया कि duplicate या substantially overlapping funding के कारण लगभग 70 मिलियन डॉलर तक का सार्वजनिक धन प्रभावित हो सकता था। इसी तरह डेनमार्क में लगभग 20,000 competitive research grants के विश्लेषण से पता चला कि फंडिंग का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत छोटे समूह के शोधकर्ताओं और सीमित शोध विषयों में केंद्रित हो रहा था। ये उदाहरण बताते हैं कि research funding में transparency, duplication और concentration की समस्या को दूर करने के लिए मजबूत डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर आवश्यक है।
भारत के सामने इस समस्या को हल करने के लिए दो प्रमुख विकल्प हैं। पहला विकल्प यह है कि भारत पूरी तरह अपना sovereign national grant registry विकसित करे। इससे भारत को अपने R&D funding infrastructure पर पूरा नियंत्रण मिलेगा और इसे केंद्र तथा राज्य सरकारों की आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया जा सकेगा। दूसरा विकल्प यह है कि भारतीय funding agencies मौजूदा वैश्विक Crossref ecosystem से जुड़ें और अपने डेटा को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार साझा करें। इससे भारत को पहले से उपलब्ध तकनीकी मानकों और वैश्विक research infrastructure का लाभ मिलेगा तथा भारतीय R&D funding को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आसानी से देखा और तुलना किया जा सकेगा।
इन दोनों के बीच एक hybrid model भारत के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। इस मॉडल में भारत अपना राष्ट्रीय पोर्टल बनाए, लेकिन उसके identifiers और data standards अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप हों। ब्रिटेन का Gateway to Research और यूरोपीय संघ का CORDIS तथा OpenAIRE इसी प्रकार की व्यवस्थाओं से सीख प्रदान करते हैं। भारत में प्रस्तावित UPMS को राष्ट्रीय स्तर के एक ऐसे पोर्टल के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों की सभी प्रमुख R&D funding agencies को शामिल किया जाए। प्रत्येक grant को एक unique identifier दिया जाए और उसे Funder ID, ROR ID और ORCID से जोड़ा जाए। इससे भारत के पास सार्वजनिक R&D निवेश का एक ऐसा unified database तैयार हो सकता है जिसे सरकार, शोधकर्ता और स्वतंत्र विश्लेषक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकें।
इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत केवल यह नहीं जान पाएगा कि कितना पैसा शोध पर खर्च किया गया, बल्कि यह भी जान सकेगा कि पैसा कहाँ गया, किसे मिला, किस उद्देश्य से मिला और उससे क्या परिणाम प्राप्त हुए। इससे duplicate funding को पहचानने, research funding के असमान वितरण को समझने, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार निवेश करने और सार्वजनिक धन की जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही, भारतीय वैज्ञानिकों और संस्थानों को वैश्विक research infrastructure से जोड़ना भी आसान होगा। इसलिए भारत के लिए R&D क्षेत्र में अगला महत्वपूर्ण कदम केवल फंडिंग बढ़ाना नहीं, बल्कि फंडिंग की पूरी यात्रा—Grant से Researcher, Institution, Research Paper, Patent और अंततः वास्तविक Impact तक—को एक विश्वसनीय डिजिटल पहचान और डेटा प्रणाली से जोड़ना होना चाहिए। यही व्यवस्था भारत के R&D ecosystem को अधिक पारदर्शी, कुशल, प्रतिस्पर्धी और परिणाम-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Source: The Hindu