नियुक्ति का संदर्भ और महत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में नीति आयोग के पुनर्गठन के बाद दो नए पूर्णकालिक सदस्यों—डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम और डॉ. जोरम अनिया—की नियुक्ति को मंजूरी दी गई है। इन नियुक्तियों के साथ अब नीति आयोग में पूर्णकालिक सदस्यों की कुल संख्या बढ़कर सात हो गई है। यह कदम सरकार की नीति निर्माण प्रक्रिया को अधिक व्यापक, विविध और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नीति आयोग देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए प्रमुख थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है।
डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम का योगदान और पृष्ठभूमि
डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम प्रशासनिक और नेतृत्व क्षमता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखते हैं। वे पहले कैपेसिटी बिल्डिंग कमीशन के सदस्य रह चुके हैं, जहां उन्होंने सिविल सेवाओं में क्षमता निर्माण और प्रशासनिक सुधारों पर महत्वपूर्ण कार्य किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘Power Within: The Leadership Legacy of Narendra Modi’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें नेतृत्व और शासन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। उनके अनुभव से नीति आयोग को प्रशासनिक दक्षता और नीति क्रियान्वयन में मजबूती मिलने की संभावना है।
डॉ. जोरम अनिया की नियुक्ति का ऐतिहासिक पहलू
डॉ. जोरम अनिया एक शिक्षाविद् और सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ हैं, जिनके पास 18 वर्षों से अधिक का शिक्षण, शोध और नीति क्षेत्र का अनुभव है। वे अरुणाचल प्रदेश प्राइवेट एजुकेशनल रेगुलेटरी कमीशन की सदस्य भी रह चुकी हैं। उनकी नियुक्ति को ऐतिहासिक इसलिए माना जा रहा है क्योंकि वे न्यीशी समुदाय की पहली महिला हैं जिन्होंने पीएचडी प्राप्त की है, साथ ही अरुणाचल प्रदेश में हिंदी भाषा में डॉक्टरेट करने वाली पहली महिला भी हैं। उन्होंने न्यीशी साहित्य और संस्कृति पर कई पुस्तकें लिखी और संपादित की हैं, साथ ही अनेक शोध प्रकाशन भी किए हैं। उनकी भागीदारी नीति आयोग में क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधता को मजबूत करेगी।
हालिया पुनर्गठन और अन्य प्रमुख बदलाव
24 अप्रैल को सरकार ने नीति आयोग में व्यापक बदलाव करते हुए नए उपाध्यक्ष और कई नए सदस्यों की नियुक्ति की थी। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी को नया उपाध्यक्ष बनाया गया, जिन्होंने सुमन बेरी का स्थान लिया। इसके अलावा अभय करंदीकर (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव) और डॉ. एम. श्रीनिवास (एम्स दिल्ली के निदेशक) को भी पूर्णकालिक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। यह परिवर्तन नीति आयोग को नई दृष्टि और विशेषज्ञता प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है।
नीति आयोग का विकास और भूमिका
नीति आयोग की स्थापना वर्ष 2015 में की गई थी, जिसने नेहरू युगीन योजना आयोग का स्थान लिया था। इसका उद्देश्य सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना, राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करना और देश के समग्र विकास के लिए प्रभावी नीतियां तैयार करना है। वर्तमान में किए गए ये बदलाव नीति आयोग के गठन के बाद सबसे बड़े पुनर्गठन के रूप में देखे जा रहे हैं, जिससे नीति निर्माण प्रक्रिया में नई ऊर्जा और नवाचार आने की उम्मीद है।