20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) और न्यूनतम RON 95 अनिवार्यता : नीति, प्रभाव और बहुआयामी बहस

सरकार का निर्णय और अधिसूचना का आधार

केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) तथा न्यूनतम 95 रिसर्च ऑक्टेन नंबर (RON) वाले पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य कर दी है। यह निर्णय फरवरी माह में जारी अधिसूचना के माध्यम से लिया गया, जिसमें तेल कंपनियों को निर्देश दिया गया कि वे भारतीय मानकों के अनुरूप ऐसा पेट्रोल उपलब्ध कराएं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि विशेष परिस्थितियों में, सीमित समय के लिए और कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में इससे छूट दी जा सकती है। यह प्रावधान नीति में लचीलापन बनाए रखने का संकेत देता है, ताकि आपूर्ति, तकनीकी या क्षेत्रीय बाधाओं से निपटा जा सके।

एथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य और सरकार की मंशा

एथेनॉल गन्ना, मक्का और अन्य अनाजों से तैयार किया जाता है। यह एक नवीकरणीय, स्वदेशी और अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन है। सरकार का मानना है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरणीय लाभ प्राप्त करने का भी दावा किया गया है। इस नीति का एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाना भी है, क्योंकि एथेनॉल की बढ़ती मांग से गन्ना, मक्का और कृषि अधिशेष की खपत बढ़ती है।

RON 95 की अनिवार्यता और तकनीकी पक्ष

सरकार ने E20 पेट्रोल के लिए न्यूनतम RON 95 अनिवार्य किया है ताकि इंजन को संभावित क्षति से बचाया जा सके। RON ईंधन की नॉकिंग प्रतिरोध क्षमता का माप है। नॉकिंग तब होती है जब ईंधन इंजन के भीतर असमान रूप से जलता है, जिससे पिंगिंग की आवाज, शक्ति में कमी और लंबे समय में इंजन को नुकसान हो सकता है। उच्च RON वाला ईंधन अधिक दबाव में भी स्थिर रहता है। एथेनॉल का ऑक्टेन मान स्वाभाविक रूप से अधिक होता है, इसलिए पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने से ईंधन की नॉकिंग प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। इसी कारण सरकार ने उच्च ऑक्टेन मान को अनिवार्य बनाकर तकनीकी जोखिम कम करने का प्रयास किया है।

वाहन उद्योग और उपभोक्ताओं पर प्रभाव

उद्योग के अनुसार 2023 से 2025 के बाद भारत में निर्मित अधिकांश वाहन E20 के अनुकूल हैं और उनसे किसी बड़े तकनीकी संकट की आशंका नहीं है। हालांकि पुराने वाहनों के लिए स्थिति अलग है। ऐसे वाहनों में 3 से 7 प्रतिशत तक माइलेज में गिरावट देखी जा सकती है। इसके अलावा रबर और प्लास्टिक जैसे ईंधन के सीधे संपर्क में आने वाले पुर्जों के तेजी से घिसने की संभावना भी जताई गई है। वाहन निर्माताओं ने यह स्वीकार किया है कि E20 के अनुकूल बनाने के लिए सामग्री संरचना में बदलाव आवश्यक है। उपभोक्ताओं के बीच इस बदलाव को लेकर चिंता और असंतोष सामने आया है, विशेषकर माइलेज घटने और रखरखाव लागत बढ़ने को लेकर।

उपभोक्ता प्रतिक्रिया और नीति को लेकर असहमति

हालिया सर्वेक्षणों से यह संकेत मिला है कि बड़ी संख्या में पेट्रोल वाहन मालिक E20 अनिवार्यता के पक्ष में नहीं हैं। उनका तर्क है कि उन्हें ईंधन चुनने का विकल्प मिलना चाहिए। सरकार ने इस असंतोष को “सीमांत दक्षता ह्रास” बताते हुए कहा है कि बेहतर इंजन ट्यूनिंग और E20 अनुकूल सामग्री से इसे कम किया जा सकता है। कुछ नीति विशेषज्ञों और सरकारी थिंक टैंक ने यह सुझाव भी दिया है कि यदि दक्षता में गिरावट होती है तो उपभोक्ताओं को कर प्रोत्साहन या अन्य राहत देकर इसकी भरपाई की जानी चाहिए।

आर्थिक लाभ, विदेशी मुद्रा बचत और मूल्य हस्तांतरण का प्रश्न

सरकार का दावा है कि 2014-15 के बाद से एथेनॉल मिश्रण के कारण पेट्रोल प्रतिस्थापन के माध्यम से ₹1.40 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत हुई है। इसके समानांतर, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों से सरकार को भारी लाभांश प्राप्त हुआ है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और नीति से हुई बचत का अपेक्षित लाभ पेट्रोल की खुदरा कीमतों में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं हुआ। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या इस नीति के आर्थिक लाभ वास्तव में उपभोक्ताओं तक पहुंचे हैं या नहीं।

कृषि क्षेत्र पर प्रभाव और पर्यावरणीय चिंताएं

एथेनॉल उत्पादन में गन्ने की भूमिका प्रमुख रही है। गन्ना किसानों को इससे सुनिश्चित बाजार और भुगतान मिला है, लेकिन यह फसल अत्यधिक जल-गहन है। कई गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में आवश्यक वर्षा न होने के कारण भूजल दोहन बढ़ा है और अस्थिर सिंचाई पद्धतियां अपनाई जा रही हैं। इससे भूमि क्षरण और जल संकट जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं। सरकार ने एथेनॉल स्रोतों में विविधता लाने की बात कही है, जैसे चावल और मक्का का बढ़ता उपयोग, लेकिन इससे खाद्यान्न आयात में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा पर दबाव जैसी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं।

अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू उद्योग की चिंता

भारत की बढ़ती एथेनॉल अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है। कुछ देशों ने भारत की आयात नीतियों को व्यापार बाधा बताया है और एथेनॉल आयात खोलने का दबाव बनाया है। दूसरी ओर घरेलू चीनी उद्योग और एथेनॉल उत्पादक संगठनों का मानना है कि आयात उदारीकरण से वर्षों के निवेश और क्षमता निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यह बहस भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापार दायित्वों के बीच संतुलन का प्रश्न उठाती है।

इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के संक्रमण से संबंध

सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि दीर्घकालिक दृष्टि से परिवहन क्षेत्र के डीकार्बनाइजेशन के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक प्रभावी माना जाता है। भारत में EV अपनाने की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है और 2030 तक 30 प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने के लिए तेज वृद्धि की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही दुर्लभ पृथ्वी तत्वों पर निर्भरता और आपूर्ति शृंखला में बाधाएं EV क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

आगे की नीति दिशा और अनिश्चितताएं

20 प्रतिशत से अधिक एथेनॉल मिश्रण को लेकर सरकार की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। कुछ बयानों में इससे आगे बढ़ने की इच्छा जताई गई है, जबकि आधिकारिक रूप से यह भी कहा गया है कि इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। इस प्रकार E20 नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा, कृषि समर्थन, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के संगम पर खड़ी एक जटिल नीति के रूप में उभरती है, जिसके दीर्घकालिक प्रभावों का संतुलित और समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।