संदर्भ और पृष्ठभूमि
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन International Labour Organization (ILO) ने अपनी प्रमुख रिपोर्ट The State of Social Justice: A Work in Progress (2025) जारी की है। यह रिपोर्ट 1995 में हुए कोपेनहेगन सामाजिक विकास शिखर सम्मेलन के 30 वर्ष पूरे होने के अवसर पर तथा द्वितीय विश्व सामाजिक विकास शिखर सम्मेलन से पहले प्रकाशित की गई है।
रिपोर्ट का उद्देश्य
यह रिपोर्ट पिछले 30 वर्षों में सामाजिक न्याय, समानता और समावेशन की दिशा में हुई वैश्विक प्रगति का आकलन करती है। साथ ही, यह उन क्षेत्रों की पहचान करती है जहां अभी भी गंभीर असमानताएं और न्याय संबंधी कमियां बनी हुई हैं।
सामाजिक न्याय के चार मूल स्तंभ
रिपोर्ट के अनुसार सामाजिक न्याय चार आधारभूत स्तंभों पर टिका है।
पहला स्तंभ मौलिक मानवाधिकार और क्षमताएं हैं, जिनमें स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक सुरक्षा शामिल हैं।
दूसरा स्तंभ अवसरों तक समान पहुंच है, जिसमें शिक्षा, रोजगार और उचित वेतन में बाधाओं को दूर करना शामिल है।
तीसरा स्तंभ निष्पक्ष वितरण है, जिसके तहत आर्थिक विकास के लाभों का न्यायसंगत बंटवारा सुनिश्चित किया जाता है।
चौथा स्तंभ निष्पक्ष संक्रमण है, जिसमें पर्यावरणीय, डिजिटल और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समावेशी ढंग से प्रबंधित करने पर जोर दिया गया है।
वैश्विक स्तर पर प्रमुख प्रगति
रिपोर्ट के अनुसार 1995 से 2025 के बीच अत्यधिक गरीबी 39 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत रह गई है।
5–14 वर्ष आयु वर्ग में बाल श्रम 25 करोड़ से घटकर 10.6 करोड़ रह गया है।
कार्यरत गरीबों का अनुपात 28 प्रतिशत से घटकर 7 प्रतिशत हो गया है।
विश्व की 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या अब किसी न किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ चुकी है।
बनी हुई वैश्विक असमानताएं
रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक आय का 20 प्रतिशत और संपत्ति का 38 प्रतिशत केवल शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास केंद्रित है।
महिलाएं औसतन पुरुषों की मजदूरी का केवल 78 प्रतिशत अर्जित करती हैं और मौजूदा गति से इस अंतर को पाटने में 50 से 100 वर्ष लग सकते हैं।
लगभग 55 प्रतिशत आय असमानता जन्म के देश पर निर्भर करती है, जो वैश्विक स्तर पर स्थान-आधारित पक्षपात को दर्शाती है।
संस्थानों पर विश्वास में गिरावट
1982 के बाद से सरकारों, ट्रेड यूनियनों और व्यवसायों पर जनता का विश्वास लगातार कम हुआ है। इसका प्रमुख कारण असमान लाभ वितरण, अनुचित पुरस्कार प्रणालियां और बढ़ती आर्थिक असमानता को माना गया है।
भारत में सामाजिक न्याय से जुड़े रुझान
भारत में बहुआयामी गरीबी 2013–14 में 29 प्रतिशत से घटकर 2022–23 में 11 प्रतिशत रह गई है।
माध्यमिक शिक्षा पूर्णता दर 2024 में 79 प्रतिशत तक पहुंच गई है और महिला साक्षरता 77 प्रतिशत हो गई है।
पीएम-किसान, आयुष्मान भारत और ई-श्रम जैसी योजनाओं के माध्यम से 55 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आए हैं।
इसके बावजूद, भारत की 80 प्रतिशत से अधिक कार्यशक्ति अभी भी औपचारिक अनुबंधों से बाहर है।
महिला श्रम भागीदारी दर 2024–25 में 37 प्रतिशत रही, जो वैश्विक औसत से कम है।
अब तक हुए प्रमुख सुधार
शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना और शिक्षा प्रोत्साहनों के माध्यम से बाल श्रम में कमी आई है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत पेंशन और मातृत्व लाभ योजनाओं का विस्तार हुआ है।
जन धन–आधार–मोबाइल (JAM) ढांचे से कल्याण योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ी और लीकेज कम हुए हैं।
ILO द्वारा चिन्हित प्रमुख चुनौतियां
आर्थिक असमानता में कमी की प्रक्रिया रुक गई है और संपत्ति का संकेंद्रण बढ़ा है।
वैश्विक स्तर पर 58 प्रतिशत श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।
आय के 71 प्रतिशत परिणाम जन्म परिस्थितियों और लिंग पर निर्भर हैं।
संस्थानों में घटता विश्वास लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए चुनौती बन रहा है।
डिजिटल विभाजन, जलवायु परिवर्तन से रोजगार हानि और वृद्ध होती जनसंख्या भविष्य में असमानता को और बढ़ा सकती है।
ILO की प्रमुख सिफारिशें
सभी नीतियों में सामाजिक न्याय को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता बताई गई है।
संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और समावेशी संवाद के माध्यम से विश्वास बहाल करने पर जोर दिया गया है।
शिक्षा, कौशल और आजीवन अधिगम में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की गई है।
सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, पोर्टेबल लाभ और उचित न्यूनतम वेतन को मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई है।
जलवायु और डिजिटल संक्रमण को इस तरह प्रबंधित करने पर बल दिया गया है कि गरिमापूर्ण रोजगार सृजित हों।
वैश्विक असमानता और प्रवासन से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करने की बात कही गई है।
यह लेख शैक्षणिक एवं सामान्य सूचना के उद्देश्य से, विषयगत जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।