श्रम संहिताएँ वेतन की नई परिभाषा तय करती हैं और श्रमिकों को सशक्त बनाती हैं

भारत के श्रम संहिताओं (Labour Codes) का कार्यान्वयन कार्यबल के वित्तीय समावेशन की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है। इन संहिताओं के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा, आय संरक्षण और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा उपायों को रोजगार संबंधों में अंतर्निहित किया गया है। अनेक बिखरे हुए श्रम कानूनों को एकीकृत करके, इन सुधारों का उद्देश्य न केवल श्रम शासन का आधुनिकीकरण करना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास का लाभ श्रमिकों तक अधिक समान रूप से पहुँचे।

हालाँकि कुछ ट्रेड यूनियनों ने इन सुधारों के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़तालों का आह्वान किया है, लेकिन श्रम संहिताओं का गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि ये सुधार मूल रूप से उन ऐतिहासिक बहिष्करणों को दूर करने के लिए बनाए गए हैं, जिनके कारण लाखों श्रमिक औपचारिक वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों से बाहर थे। इन संहिताओं का उद्देश्य श्रमिकों को संगठित और सुरक्षित प्रणाली में एकीकृत करना है।

वेतन की परिभाषा में सुधार

श्रम संहिताओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वित्तीय समावेशन संबंधी परिणाम ‘वेतन’ की परिभाषा में सुधार है। पहले कई प्रतिष्ठान सामाजिक सुरक्षा अंशदान को कम करने के लिए कुल वेतन का केवल 30–35 प्रतिशत ही मूल वेतन, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस के रूप में देते थे। अब नई व्यवस्था के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि वेतन कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50 प्रतिशत हो। इससे सामाजिक सुरक्षा अंशदान और उससे मिलने वाले लाभों में वृद्धि होगी, जिसके परिणामस्वरूप भविष्य निधि (PF), पेंशन और ग्रेच्युटी की राशि बढ़ेगी और दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी।

इसके अतिरिक्त, निश्चित अवधि (Fixed-term) के कर्मचारियों को अब एक वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद ग्रेच्युटी का अधिकार प्राप्त होगा। यह प्रावधान आधुनिक श्रम बाजार की वास्तविकताओं को स्वीकार करता है और निश्चित अवधि के रोजगार को भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाता है। दशकों तक ऐसे श्रमिक जिन्होंने अस्थायी या निश्चित अवधि के अनुबंधों पर काम किया, वे बिना किसी अंतिम वित्तीय लाभ के नौकरी से बाहर हो जाते थे। ग्रेच्युटी के विस्तार से अल्पकालिक रोजगार भी अब संपत्ति निर्माण और आय सुरक्षा का माध्यम बन गया है।

इस प्रकार PF, पेंशन और ग्रेच्युटी केवल सेवानिवृत्ति लाभ नहीं रह जाते, बल्कि वित्तीय समावेशन के प्रभावी उपकरण बन जाते हैं, जो श्रमिकों को बचत बनाने, जीवन-चक्र से जुड़े जोखिमों को संभालने और रोजगार परिवर्तन के दौरान असुरक्षा को कम करने में मदद करते हैं। स्वाभाविक रूप से इससे बड़े कॉरपोरेट समूहों, जैसे टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएल टेक और एलएंडटी जैसी कंपनियों पर वित्तीय दायित्व बढ़ा है, जहाँ कार्यबल का आकार बड़ा है और निश्चित अवधि के रोजगार पर निर्भरता अधिक है।

कुछ रिपोर्टों में यह कहा गया है कि कंपनियों को ग्रेच्युटी प्रावधानों के कारण “करोड़ों का नुकसान” हुआ है, लेकिन इसे सही परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। श्रम संहिताओं के कारण होने वाला अतिरिक्त व्यय सीधे तौर पर श्रमिकों की आय सुरक्षा में वृद्धि करता है, जिससे उनकी वित्तीय क्षमता और क्रय शक्ति बढ़ती है। इसका अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक गुणक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे उपभोग, बचत और सामाजिक सुरक्षा कवरेज में वृद्धि होती है। यह लाभ श्रमिकों के पक्ष में मूल्य के अधिक न्यायसंगत पुनर्वितरण का संकेत देता है और नियोक्ताओं के हितों के क्षरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

व्यापक आर्थिक प्रभाव

श्रम संहिताओं के तहत वित्तीय समावेशन केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित नहीं है। गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना एक ऐतिहासिक सुधार है। पहली बार इन श्रमिकों को औपचारिक श्रम कानून ढाँचे में मान्यता दी गई है, जिससे उन्हें बीमा, PF और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच मिल सकेगी। राज्यों और रोजगारों के बीच लाभों की पोर्टेबिलिटी प्रवासी और असंगठित श्रमिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अब तक स्थायी वित्तीय प्रणालियों से बाहर रहे हैं।

वेतन संहिता सभी क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करके, मनमानी कटौतियों को सीमित करके और समय पर भुगतान को अनिवार्य बनाकर आय सुरक्षा को और मजबूत करती है। ये सभी उपाय मिलकर आय को स्थिर बनाते हैं और श्रमिकों की औपचारिक अर्थव्यवस्था में सार्थक भागीदारी को बढ़ावा देते हैं।

श्रमिकों की ओर आय के पुनर्वितरण के महत्वपूर्ण व्यापक आर्थिक प्रभाव होते हैं। बढ़ी हुई आय सुरक्षा से श्रमिकों की क्रय शक्ति बढ़ती है, जिससे उपभोग में वृद्धि, बेहतर बचत व्यवहार और औपचारिक वित्तीय संस्थानों के साथ अधिक जुड़ाव होता है। शेयरधारकों की आय जहाँ अक्सर वित्तीय बाजारों या बाहरी परिसंपत्तियों में निवेश हो जाती है, वहीं श्रमिकों की आय मुख्यतः घरेलू अर्थव्यवस्था में ही परिसंचारित होती है, जिससे मांग-आधारित विकास को बल मिलता है। इस दृष्टि से श्रम संहिताएँ समावेशी विकास के उपकरण के रूप में कार्य करती हैं।

पुराने श्रम कानून और सुधारों की आवश्यकता

इन प्रगतियों के बावजूद कुछ ट्रेड यूनियन श्रम संहिताओं का विरोध कर रही हैं और उन्हें श्रमिक-विरोधी सुधारों के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यद्यपि कार्यान्वयन और प्रवर्तन से जुड़ी चिंताएँ वैध हो सकती हैं, लेकिन पूर्ण विरोध इन संहिताओं में निहित वास्तविक लाभों की अनदेखी करता है। कई मामलों में हड़तालों का आह्वान सुधारों की मूल भावना के बजाय परिवर्तन के विरोध से प्रेरित प्रतीत होता है, जिससे जनसमझ प्रभावित होती है।

यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में श्रम कानून स्थिर नहीं रह सकते। पुराने श्रम कानून बिखरे हुए, पुराने और बदलते श्रम बाजार के लिए अनुपयुक्त हो चुके थे। चार श्रम संहिताओं में समेकन से अनुपालन सरल हुआ है, पारदर्शिता बढ़ी है और एक अधिक पूर्वानुमेय नियामक वातावरण बना है, जो श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के लिए लाभकारी है।

भारत की श्रम संहिताओं को केवल नियामक पुनर्संरचना के रूप में नहीं, बल्कि वित्तीय समावेशन की दिशा में एक संरचनात्मक हस्तक्षेप के रूप में समझा जाना चाहिए। ग्रेच्युटी के विस्तार, सामाजिक सुरक्षा कवरेज के विस्तार और लंबे समय से चले आ रहे कानूनी बहिष्करणों को समाप्त करके, ये संहिताएँ पूँजी से श्रम की ओर आर्थिक मूल्य के अधिक न्यायपूर्ण पुनर्वितरण को संभव बनाती हैं। इससे आय सुरक्षा मजबूत होती है, वित्तीय गरिमा बढ़ती है और आर्थिक विकास को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ा जाता है। श्रम संहिताओं की वास्तविक सफलता विरोध या बयानबाजी में नहीं, बल्कि उनके प्रभावी कार्यान्वयन में निहित है, ताकि प्रत्येक श्रमिक भारत की विकास गाथा का सक्रिय भागीदार बन सके।

आर. मुकुंदन भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के नामित अध्यक्ष हैं तथा टाटा केमिकल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं।

Source: The Hindu