वैश्विक मीथेन स्थिति रिपोर्ट – 2025

वैश्विक मीथेन स्थिति रिपोर्ट–2025 एक व्यापक वैश्विक आकलन है, जिसका नेतृत्व United Nations Environment Programme (UNEP) ने Climate and Clean Air Coalition (CCAC) के सहयोग से किया है। यह रिपोर्ट मानव-जनित (Anthropogenic) मीथेन (CH₄) उत्सर्जन की स्थिति, प्रवृत्तियों तथा Global Methane Pledge (GMP) के तहत 2030 तक निर्धारित लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति का मूल्यांकन करती है। रिपोर्ट 17 नवंबर 2025 को COP30, बेलेम (ब्राज़ील) के अवसर पर जारी की गई।

मीथेन एक अत्यंत शक्तिशाली अल्पकालिक ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय में अधिक ऊष्मा रोकती है। यह जमीनी स्तर के ओज़ोन (O₃) का प्रमुख पूर्वगामी भी है, जो मानव स्वास्थ्य, फसलों और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है। इसी कारण मीथेन उत्सर्जन में कमी को जलवायु परिवर्तन से निपटने का त्वरित और प्रभावी उपाय माना जाता है।

Global Methane Pledge की शुरुआत वर्ष 2021 में COP26 के दौरान की गई थी। यह एक गैर-बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को 2020 के स्तर से कम से कम 30% घटाना है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025, GMP के कार्यान्वयन का मध्य बिंदु है। अप्रैल 2025 तक 159 देश और यूरोपीय आयोग इस पहल में शामिल हो चुके थे, जो वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 57% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

रिपोर्ट बताती है कि मानव-जनित मीथेन उत्सर्जन मुख्यतः तीन क्षेत्रों से आता है—कृषि (42%), ऊर्जा क्षेत्र (38%) और अपशिष्ट प्रबंधन (20%)। G20+ देश कुल वैश्विक मीथेन उत्सर्जन के लगभग 65% के लिए जिम्मेदार हैं। वर्तमान कानूनों के आधार पर, 2020 में लगभग 352 मिलियन टन मीथेन उत्सर्जन हुआ था, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 369 मिलियन टन होने का अनुमान है, यानी लगभग 5% की वृद्धि। यदि केवल वर्तमान राष्ट्रीय योजनाओं (NDCs और Methane Action Plans) को पूरी तरह लागू भी कर दिया जाए, तो 2030 तक केवल लगभग 8% की कटौती ही संभव होगी, जो GMP के 30% लक्ष्य से काफी कम है।

रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि यदि तकनीकी रूप से अधिकतम संभव कटौती (Maximum Technically Feasible Reductions) को अपनाया जाए, तो 2030 तक लक्ष्य के करीब पहुँचा जा सकता है। इस तकनीकी क्षमता का लगभग 72% हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र में निहित है, जबकि अपशिष्ट क्षेत्र में 18% और कृषि में 10% क्षमता है। पूर्ण तकनीकी कार्यान्वयन से 2030 तक हर वर्ष 1.8 लाख से अधिक असमय मौतों को रोका जा सकता है और लगभग 1.9 करोड़ टन फसल क्षति से बचा जा सकता है। साथ ही 2050 तक लगभग 0.2°C वैश्विक ताप वृद्धि को भी टाला जा सकता है।

आर्थिक दृष्टि से रिपोर्ट का आकलन है कि 2030 तक पूर्ण तकनीकी कार्यान्वयन के लिए प्रति वर्ष लगभग 127 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता होगी। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 80% से अधिक कटौती कम लागत पर संभव है। इससे होने वाले स्वास्थ्य, कृषि और जलवायु लाभों का कुल मूल्य 2030 तक प्रति वर्ष 330 अरब डॉलर से अधिक आंका गया है, जो लागत से कहीं अधिक है।

रिपोर्ट के अनुसार 2023 में India का मीथेन उत्सर्जन लगभग 31 मिलियन टन प्रति वर्ष था, जो 2020 की तुलना में लगभग 8.4% अधिक है। इसमें कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 18 मिलियन टन, अपशिष्ट क्षेत्र का लगभग 9.7 मिलियन टन और जीवाश्म ईंधन का लगभग 3.1 मिलियन टन है। भारत वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जक है और कुल उत्सर्जन में इसका हिस्सा लगभग 8.3% है। रिपोर्ट में भारत को GMP का पक्षकार नहीं दिखाया गया है।

रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि भारत की NDCs में कृषि क्षेत्र—जो भारत का सबसे बड़ा मीथेन स्रोत है—से उत्सर्जन घटाने के लिए स्पष्ट और ठोस उपायों का अभाव है। विशेष रूप से चावल की खेती से मीथेन उत्सर्जन 2020 से 2023 के बीच भारत और पाकिस्तान में लगभग 8% बढ़ा है, जिसे गंभीर चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है। अपशिष्ट प्रबंधन के संदर्भ में, खुले में कचरा जलाने की समस्या भारत, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में 40% से अधिक बताई गई है, जो मीथेन और वायु प्रदूषण दोनों को बढ़ाती है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत के लिए उच्च प्रभाव वाले प्राथमिक कदमों में बेहतर धान जल प्रबंधन, जैविक कचरे का पृथक्करण और उपचार (कम्पोस्टिंग, बायोगैस/एनारोबिक डाइजेशन), लैंडफिल गैस की पुनर्प्राप्ति, तथा ऊर्जा क्षेत्र में रिसाव पहचान और मरम्मत (LDAR), वेंटिंग और फ्लेयरिंग में कमी जैसे उपाय शामिल हैं।