पांच राज्यों में किसानों का प्रदर्शन, पंजाब सबसे अधिक प्रभावित
धान की बुवाई के मौसम की शुरुआत के साथ ही पंजाब, हरियाणा सहित पांच राज्यों में किसानों ने यूरिया और डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) उर्वरकों की कथित कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। पंजाब में किसान मजदूर मोर्चा (KMM) के नेतृत्व में 74 स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित किए गए। वहीं, पंजाब भाजपा अध्यक्ष सरदार केवल सिंह ढिल्लों ने केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री को पत्र लिखकर राज्य में उर्वरकों की निर्बाध और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की।
पंजाब में उर्वरक की कमी को लेकर विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
पंजाब में हर साल क्यों उठता है उर्वरक संकट?
पंजाब की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से गेहूं और धान की खेती पर आधारित है। राज्य में उर्वरकों की मांग विशेष मौसमों में अचानक बढ़ जाती है। रबी सीजन में अक्टूबर-नवंबर के दौरान गेहूं की बुवाई के समय डीएपी की मांग चरम पर होती है, जबकि जून से अगस्त के बीच धान की खेती के लिए यूरिया की आवश्यकता सबसे अधिक रहती है।
केंद्र सरकार राज्यों को उर्वरकों की आपूर्ति चरणबद्ध तरीके से करती है। किसानों का आरोप है कि आवश्यक मात्रा समय पर नहीं पहुंचती या स्थानीय मांग के अनुरूप उपलब्ध नहीं होती। धान और गेहूं की बुवाई के सीमित समय में हजारों किसान एक साथ उर्वरक खरीदने पहुंचते हैं, जिससे लंबी कतारें और स्थानीय स्तर पर कमी की स्थिति पैदा हो जाती है। कई किसान संगठनों ने समय-समय पर उर्वरक विक्रेताओं द्वारा जमाखोरी और अन्य उत्पादों को उर्वरकों के साथ जबरन बेचने के आरोप भी लगाए हैं।
पश्चिम एशिया का संघर्ष कैसे बढ़ा रहा है समस्या?
भारत फॉस्फेट आधारित उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इस आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और व्यापारिक व्यवधानों का असर उर्वरकों की उपलब्धता पर भी पड़ रहा है।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल यूरिया आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन से आया। डीएपी के मामले में भी सऊदी अरब भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और डीएपी दोनों की कीमतों में हाल के महीनों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण केंद्र सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी काफी बढ़ने की संभावना है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि किसानों को आवश्यक उर्वरकों की आपूर्ति बनाए रखी जाएगी।
धान सीजन के लिए पंजाब को कितने उर्वरकों की आवश्यकता?
अनुमानों के अनुसार, इस खरीफ सीजन में पंजाब में लगभग 30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होने की संभावना है। इसके लिए राज्य को लगभग 16 लाख मीट्रिक टन यूरिया की आवश्यकता होगी। पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, राज्य को केंद्र सरकार से चरणबद्ध तरीके से उर्वरक मिल रहे हैं। प्रारंभिक चरण में लगभग 3.75 लाख मीट्रिक टन और उसके बाद 4.5 लाख मीट्रिक टन से अधिक यूरिया प्राप्त हुआ।
नवीनतम खेपों को मिलाकर अब तक 11 लाख मीट्रिक टन से अधिक यूरिया राज्य को मिल चुका है। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति संतोषजनक है और शेष आपूर्ति भी शीघ्र मिलने की उम्मीद है। धान की खेती के लिए यूरिया के अलावा लगभग 2 लाख मीट्रिक टन डीएपी की भी आवश्यकता होती है। राज्य सरकार का दावा है कि डीएपी की उपलब्धता फिलहाल पर्याप्त है।
उर्वरक विक्रेताओं पर किसानों के आरोप
किसानों की सबसे बड़ी शिकायत उर्वरक विक्रेताओं द्वारा अतिरिक्त उत्पादों की अनिवार्य बिक्री को लेकर है। किसानों का आरोप है कि कई विक्रेता दो बोरी यूरिया या डीएपी के साथ एक बोतल नैनो यूरिया, पोटाश या अन्य जैव-उत्पाद खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। यदि किसान इन अतिरिक्त उत्पादों को खरीदने से इनकार करते हैं तो उन्हें उर्वरक उपलब्ध नहीं कराया जाता। अमृतसर और अबोहर सहित कई क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि बाजार में मुख्य उर्वरकों की तुलना में जैव-उत्पाद पहले पहुंच जाते हैं और किसानों पर इन्हें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इस विषय पर किसानों ने पहले भी कई बार शिकायतें दर्ज कराई हैं।
किसानों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
सरकारी सब्सिडी के कारण 45 किलोग्राम की एक बोरी यूरिया लगभग 267 रुपये में उपलब्ध होती है, जबकि 50 किलोग्राम डीएपी की कीमत लगभग 1,350 रुपये है। दूसरी ओर, 400 मिलीलीटर की नैनो यूरिया बोतल की कीमत 225 से 250 रुपये तक होती है। एक किसान सामान्यतः प्रति एकड़ लगभग तीन बोरी यूरिया का उपयोग करता है। यदि प्रत्येक दो बोरियों के साथ एक अतिरिक्त उत्पाद खरीदना पड़े तो खेती की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है। किसानों का कहना है कि यह अतिरिक्त खर्च उनकी आय पर सीधा प्रभाव डालता है।
केंद्र सरकार की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था
केंद्र सरकार किसानों को उर्वरक सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी प्रदान करती है। भाजपा नेता सुनील जाखड़ के अनुसार, भारत लगभग 100 रुपये प्रति किलोग्राम की लागत से यूरिया आयात करता है, लेकिन किसानों को यह मात्र लगभग 6 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार प्रत्येक 45 किलोग्राम यूरिया बैग पर लगभग 4,250 रुपये तथा प्रत्येक डीएपी बैग पर लगभग 3,200 रुपये की सब्सिडी देती है। नवंबर 2012 से यूरिया की अधिकतम खुदरा कीमत लगभग स्थिर बनी हुई है।
जाखड़ के अनुसार पंजाब में हर वर्ष लगभग 6.88 करोड़ यूरिया बैग और 1.60 करोड़ डीएपी बैग की खपत होती है। मौजूदा सब्सिडी दरों के आधार पर पंजाब के किसानों को इस वर्ष लगभग 32,000 करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी का लाभ मिलने का अनुमान है।
केंद्र सरकार का दावा: पर्याप्त है राष्ट्रीय भंडार
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा जारी बयान के अनुसार, देश में उर्वरकों की समग्र उपलब्धता संतोषजनक बनी हुई है। खरीफ 2026 के लिए देशभर में कुल 383.9 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। 8 जून तक उपलब्ध कुल स्टॉक लगभग 197.56 लाख मीट्रिक टन था, जो कुल आवश्यकता का 51 प्रतिशत से अधिक है। सामान्यतः इस समय तक लगभग 33 प्रतिशत स्टॉक उपलब्ध रहता है। विभाग के अनुसार 7 जून तक किसान लगभग 86.65 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरक खरीद चुके थे, जो कुल अनुमानित आवश्यकता का लगभग 22.57 प्रतिशत है।
किसानों और सरकार के बीच जारी असहमति
जहां केंद्र और राज्य सरकारें उर्वरकों की उपलब्धता को पर्याप्त बता रही हैं, वहीं किसान संगठन जमीनी स्तर पर गंभीर कमी का दावा कर रहे हैं। किसान मजदूर मोर्चा के संयोजक सरवन सिंह पंधेर ने चेतावनी दी है कि यदि समय पर पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध नहीं कराए गए तो आंदोलन और तेज हो सकता है। धान की बुवाई का मुख्य सीजन शुरू होने वाला है और ऐसे समय में उर्वरकों की उपलब्धता किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। यदि आपूर्ति और वितरण व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो कृषि उत्पादन और किसानों की लागत दोनों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।