National Green Tribunal (NGT) की चेन्नई स्थित साउदर्न ज़ोन बेंच ने दक्षिण भारत के पाँच राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी को National Clean Air Programme (NCAP) के तहत तैयार किए गए स्टेट एक्शन प्लान (SAP) को सख्ती और तय समयसीमा में लागू करने का निर्देश दिया है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि यदि स्वच्छ वायु के लिए आवंटित धन का प्रभावी उपयोग नहीं किया गया तो राज्यों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (जुर्माना) लगाया जा सकता है, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
फंड उपयोग में अनियमितता और कर्नाटक का मामला
NGT के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों में कर्नाटक का मामला विशेष रूप से सामने आया, जहाँ 2019-20 से 2023-24 के बीच ₹597.54 करोड़ जारी किए गए। इनमें से Bengaluru को ₹541.1 करोड़ मिले, लेकिन अक्टूबर 2024 तक केवल 13% राशि ही खर्च की गई थी। हालांकि बाद में 2025 तक कुल फंड का लगभग 76% उपयोग होने की जानकारी दी गई, फिर भी न्यायाधिकरण ने खर्च के पैटर्न पर गंभीर चिंता जताई। पाया गया कि लगभग 86% राशि सड़क की धूल नियंत्रण पर खर्च की गई, जबकि वाहन उत्सर्जन (6.6%) और बायोमास जलाने (4.1%) जैसे प्रमुख प्रदूषण स्रोतों पर बहुत कम ध्यान दिया गया, जिसे NGT ने “असंतुलित व्यय” बताते हुए इसे तार्किक रूप से संतुलित करने की आवश्यकता बताई।
NGT के प्रमुख निर्देश
इस आदेश में NGT ने कुल 13 महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। इनमें छह महीने के भीतर सेक्टर-वार कार्ययोजना तैयार करना, कर्नाटक में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में मासिक समीक्षा बैठकें आयोजित करना और दक्षिणी राज्यों के बीच “एयरशेड स्तर” पर समन्वय के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाना शामिल है। साथ ही, सभी राज्यों को छह महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी तरीके से हो रहा है।
वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति
NGT के सामने प्रस्तुत वायु गुणवत्ता आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ कि कई शहरों में PM2.5 और PM10 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से अधिक है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देशों से 4 से 6 गुना तक ज्यादा पाया गया। विशेष रूप से Hyderabad, Visakhapatnam, Eloor और Kalaburagi जैसे शहरों में लगातार प्रदूषण का स्तर अधिक दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय संकट की ओर संकेत करता है।
राज्यों के प्रयास और चुनौतियाँ
राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा में मिश्रित स्थिति सामने आई। कर्नाटक ने वाहन स्क्रैपिंग नीति तो बनाई है, लेकिन उसके लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा अभी अधूरा है। तमिलनाडु ने कई उद्योगों को ऑनलाइन उत्सर्जन निगरानी प्रणाली से जोड़ा है और इलेक्ट्रिक वाहन नीति लागू की है, लेकिन स्क्रैपिंग नीति अभी अधूरी है। केरल में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पुडुचेरी ने कोयला और पेट-कोक पर प्रतिबंध लगाकर तथा स्क्रैपिंग नीति लागू करके कुछ ठोस कदम उठाए हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने औद्योगिक ईंधन परिवर्तन से जुड़ी नीतियाँ बनाई हैं, पर उनका क्रियान्वयन स्पष्ट नहीं है।
निष्कर्ष और महत्व
यह आदेश दर्शाता है कि केवल योजनाएँ बनाना और फंड आवंटित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सही और संतुलित उपयोग भी उतना ही जरूरी है। NGT का यह हस्तक्षेप दक्षिण भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण को गंभीरता से लेने और प्रभावी नीति क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि अब वायु प्रदूषण की समस्या केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि दक्षिणी राज्यों में भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था, समन्वय और जवाबदेही की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।