प्रख्यात कन्नड़ उपन्यासकार एस. एल. भैरप्पा का निधन

निधन और अंतिम संस्कार की जानकारी

प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक और सरस्वती सम्मान से सम्मानित S. L. Bhyrappa का 24 सितंबर 2025 को बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 94 वर्ष के थे और लंबे समय से आयु-सम्बंधी बीमारियों से पीड़ित थे। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, दोपहर 2.38 बजे उन्हें हृदयाघात हुआ।
उनका अंतिम संस्कार 26 सितंबर को मैसूरु में किया जाएगा, जहां वे कई वर्षों तक रहे। 25 सितंबर को पार्थिव शरीर को बेंगलुरु के रविंद्र कलाक्षेत्र में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा।

साहित्यिक जीवन और उपन्यास पर केंद्रित लेखन

एस. एल. भैरप्पा ने अपने छह दशक से अधिक लंबे साहित्यिक जीवन में उपन्यास को ही अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाया। उनका पहला उपन्यास ‘भीमकाय’ 1958 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने कुल 25 उपन्यास लिखे। उनका अंतिम उपन्यास ‘उत्तरकांड’ (2017) था, जिसमें रामायण को स्त्री दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया गया। इसके बाद उन्होंने लेखन से संन्यास की घोषणा की थी।

लोकप्रियता और अनुवाद

भैरप्पा कन्नड़ भाषा के सबसे अधिक बिकने वाले उपन्यासकारों में शामिल रहे। उनके उपन्यास अनेक संस्करणों में प्रकाशित होते रहे और आज भी पुनर्मुद्रित किए जा रहे हैं। उनके लगभग सभी उपन्यासों का कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी और अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ, जिससे उन्हें अखिल भारतीय पाठक वर्ग प्राप्त हुआ।

प्रमुख कृतियां और सम्मान

उनके प्रमुख उपन्यासों में ‘वंशवृक्ष’ (1965), ‘गृहभंग’ (1970) और महाभारत पर आधारित ‘पर्व’ (1979) को कन्नड़ साहित्य की क्लासिक रचनाएं माना जाता है।
उपन्यास ‘मंद्रा’ (2001) के लिए उन्हें 2010 में सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें पद्म श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 2023 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।

सिनेमा और टेलीविजन में योगदान

भैरप्पा के कई उपन्यासों का रूपांतरण प्रसिद्ध रंगकर्मी और फिल्मकारों द्वारा किया गया। B. V. Karanth, Girish Karnad, Girish Kasaravalli और T. N. Seetharam जैसे रचनाकारों ने उनके उपन्यासों पर आधारित फिल्में बनाईं। ये फिल्में भारतीय समानांतर सिनेमा आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं। ‘गृहभंग’ का टेलीविजन रूपांतरण भी किया गया।

वैचारिक रुख और विवाद

अपने उत्तरवर्ती वर्षों में भैरप्पा अपने हिंदुत्व समर्थक विचारों के लिए भी जाने गए। उनके कुछ उपन्यासों, विशेष रूप से ‘आवरण’ (2007), ने मुस्लिम शासकों और धर्मांतरण के चित्रण को लेकर व्यापक विवाद उत्पन्न किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री Narendra Modi का समर्थन भी किया।
प्रगतिशील आलोचकों का मत रहा कि उनकी रचनाओं में रूढ़िवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है, जो नव्य, बंडाया और दलित साहित्य आंदोलनों से भिन्न था, फिर भी उनकी लोकप्रियता बनी रही।

प्रारंभिक जीवन और अकादमिक सेवा

एस. एल. भैरप्पा का जन्म हासन ज़िले के चन्नरायपट्टण तालुक के संतेशिवरा गांव में हुआ था। उन्होंने हासन और मैसूरु में शिक्षा प्राप्त की। वे दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में गुजरात और नई दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में सेवाएं देते रहे, साथ ही निरंतर लेखन कार्य भी करते रहे।