भारत का राजकोषीय घाटा अप्रैल-जुलाई 2026-27 में घटकर ₹4.55 लाख करोड़
वित्त वर्ष 2026-27 के अप्रैल-जुलाई के चार महीनों में भारत का राजकोषीय घाटा ₹4.55 लाख करोड़ रहा। यह चालू वित्त वर्ष के लिए निर्धारित कुल राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का 26.8% है।
पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में राजकोषीय घाटा ₹4.70 लाख करोड़ था, जो पूरे वर्ष के अनुमान का 29.9% था। इस प्रकार, पिछले वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में राजकोषीय घाटे की स्थिति में सुधार देखा गया है।
अप्रैल-जुलाई 2026-27 के दौरान सरकार की कुल प्राप्तियां ₹13.07 लाख करोड़ रहीं। यह चालू वित्त वर्ष के कुल बजट अनुमान का 35.8% है। इसी अवधि में सरकार का कुल व्यय ₹17.62 लाख करोड़ रहा।
कुल व्यय चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान का 32.9% है। अप्रैल-जुलाई के दौरान सरकार की राजस्व प्राप्तियां ₹12.68 लाख करोड़ रहीं। इसमें कर राजस्व ₹8.45 लाख करोड़ रहा। इसी अवधि में गैर-कर राजस्व ₹4.23 लाख करोड़ दर्ज किया गया।
गैर-कर राजस्व में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से मिलने वाला लाभांश, स्पेक्ट्रम से आय तथा विभिन्न सरकारी शुल्क शामिल होते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा केंद्र सरकार को दिया जाने वाला लाभांश भी गैर-कर राजस्व का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
RBI ने केंद्र सरकार को ₹2.87 लाख करोड़ का लाभांश मंजूर किया, जिससे सरकार की गैर-कर आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। पिछले वर्ष RBI ने केंद्र सरकार को ₹2.69 लाख करोड़ का लाभांश हस्तांतरित किया था। RBI से मिले अधिक लाभांश ने सरकार की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और राजकोषीय घाटा कम रखने में सहायता की।
अप्रैल-जुलाई अवधि में राजस्व घाटा ₹43,645 करोड़ रहा। यह पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित राजस्व घाटे के लक्ष्य का 7.4% है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.4% तक सीमित करने का लक्ष्य हासिल किया था। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य GDP के 4.3% तक और कम किया गया है। सरकार का यह लक्ष्य राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की प्रक्रिया का हिस्सा है।
पश्चिम एशिया संकट के कारण पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि से सरकार के सब्सिडी खर्च बढ़ने की चिंता बनी हुई है। बढ़ता सब्सिडी बिल सरकार के कुल व्यय में वृद्धि कर सकता है और भविष्य में राजकोषीय घाटे पर दबाव डाल सकता है।
राजकोषीय घाटे में कमी अर्थव्यवस्था की वित्तीय मजबूती और स्थिरता को बढ़ाती है। कम राजकोषीय घाटे से सरकार की उधारी की आवश्यकता कम होती है, जिससे बैंकों के पास निजी क्षेत्र और उपभोक्ताओं को ऋण देने के लिए अधिक धन उपलब्ध हो सकता है। इससे निवेश, उपभोग, आर्थिक विकास और मूल्य स्थिरता को समर्थन मिलने की संभावना बढ़ती है।