हरित ऊर्जा विनिर्माण में संरचनात्मक चुनौतियाँ और PLI योजनाओं की सीमाएँ

भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं को प्रमुख औद्योगिक साधन के रूप में अपनाया है। दूरसंचार क्षेत्र में PLI योजना की सफलता से उत्साहित होकर नीति-निर्माताओं को उम्मीद थी कि यही मॉडल हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारत को एक आयात-निर्भर देश से वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदल देगा। हालांकि, सौर ऊर्जा और बैटरी विनिर्माण जैसे उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में इस योजना के क्रियान्वयन ने कई संरचनात्मक और तकनीकी कमजोरियों को उजागर कर दिया है।

उच्च दक्षता वाले सोलर फोटोवोल्टिक विनिर्माण में यह असमानता साफ दिखती है। जहां डाउनस्ट्रीम यानी मॉड्यूल असेंबली से जुड़े लक्ष्य अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से पूरे हो रहे हैं और 2025 के मध्य तक अपने निर्धारित लक्ष्य का लगभग 56 प्रतिशत हासिल कर लिया गया है, वहीं अपस्ट्रीम खंडों की स्थिति काफी कमजोर बनी हुई है। पॉलीसिलिकॉन और वेफर निर्माण, जो सोलर वैल्यू चेन के सबसे जटिल और तकनीक-प्रधान हिस्से हैं, अपने लक्ष्यों का क्रमशः केवल 14 प्रतिशत और 10 प्रतिशत ही पूरा कर पाए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब भी कच्चे माल, उन्नत मशीनरी और विशेष तकनीकी विशेषज्ञता के लिए आयात पर निर्भर है। इसी कारण सरकार को इन उच्च पूंजी-व्यय वाले अपस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स के जोखिम को कम करने के लिए अतिरिक्त पूंजी सब्सिडी देने पर विचार करना पड़ रहा है।

इसी तरह की समस्याएं उन्नत रसायन सेल (बैटरी) विनिर्माण की PLI योजना में भी सामने आ रही हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति की रीढ़ मानी जाती है। 18,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 50 गीगावॉट-घंटा घरेलू बैटरी सेल क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 2025 के अंत तक केवल लगभग 1.4 गीगावॉट-घंटा यानी लक्ष्य का 2.8 प्रतिशत ही स्थापित हो सका है। नीति और वास्तविकता के इस अंतर का एक बड़ा कारण घरेलू मूल्य संवर्धन से जुड़ी कठोर शर्तें हैं, जिनके तहत दो वर्षों में 25 प्रतिशत और पांच वर्षों में 60 प्रतिशत स्थानीय मूल्यवर्धन अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही गीगाफैक्ट्री जैसी अत्यंत जटिल विनिर्माण इकाइयों की स्थापना से जुड़ी तकनीकी बाधाएं भी प्रगति को धीमा कर रही हैं।

इन चुनौतियों को और गंभीर बनाता है विदेशी तकनीकी विशेषज्ञों, विशेषकर चीनी विशेषज्ञों, से जुड़ा वीज़ा प्रतिबंध, जबकि कई संयंत्रों की स्थापना में उन्हीं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। ऐसे में यह धारणा कि केवल पूंजी समर्थन देकर उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा सकता है, व्यावहारिक नहीं लगती। बैटरी सेल और उन्नत सोलर घटकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन केवल धन से नहीं, बल्कि दशकों के अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और कुशल मानव संसाधन के विकास से संभव होता है।

हालांकि बड़े औद्योगिक समूह अंतरराष्ट्रीय तकनीक हस्तांतरण के माध्यम से इस अंतर को पाटने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन ये प्रक्रियाएं अत्यधिक पूंजी-गहन होती हैं और अल्पकाल में अपेक्षित परिणाम नहीं देतीं। परिणामस्वरूप, कई कंपनियां तय समय-सीमा में लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण भारी दंड का सामना कर रही हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि PLI योजना की रूपरेखा में पुनर्विचार की आवश्यकता है, जहां केवल कंपनियों की वित्तीय क्षमता या नेटवर्थ के बजाय तकनीकी विशेषज्ञता, अनुसंधान क्षमता और दीर्घकालिक कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाए। तभी भारत जैसे देश, जो स्वयं को हरित ऊर्जा विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाना चाहते हैं, इस लक्ष्य को वास्तविक रूप दे पाएंगे।

Source: The Hindu

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