कोल्हान क्षेत्र, जिसमें वर्तमान झारखंड के पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले शामिल हैं, के मूल, स्वायत्त निवासी हो आदिवासी थे। उनकी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था, भूमि पर सामुदायिक अधिकार और धार्मिक आस्था बाहरी शासन से स्वतंत्र थी। हो समुदाय का विश्वास था कि कोल्हान की भूमि उन्हें उनके सर्वोच्च देवता सिंग-बोंगा द्वारा प्रदत्त है, इसलिए किसी बाहरी सत्ता का शासन स्वीकार्य नहीं था।
ब्रिटिश व्यापार विस्तार और दमन की नीतियाँ
लगभग 1820–21 में कोल्हान क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन आया। मद्रास के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए ब्रिटिश प्रशासन को आदिवासी क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से चाईबासा क्षेत्र में ब्रिटिश शिविर स्थापित किया गया, जिसने हो आदिवासियों के साथ टकराव को जन्म दिया।
1821 में आदिवासियों को एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया। इसके तहत प्रति हल आठ आने कर, बाहरी समुदायों को आदिवासी भूमि में बसने की अनुमति, तथा हिंदी और उड़िया भाषाओं का आरोपण शामिल था। गैर-आदिवासी जमींदारों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ उत्पीड़न जैसे दमनकारी अनुभवों ने असंतोष को और गहरा किया।
1831 का कोल विद्रोह और उसके बाद
इन परिस्थितियों के विरुद्ध 1831 में कोल विद्रोह हुआ, जो कोल्हान के साथ-साथ रांची और हजारीबाग तक फैला। यद्यपि इसे आंशिक रूप से दबा दिया गया, पर प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ। अक्टूबर 1836 से ब्रिटिश सेनाओं ने लगभग 22 पीरह और 600 गाँवों पर कब्जा कर ‘कोल्हान एस्टेट गवर्नमेंट’ की स्थापना की घोषणा की।
1837: सेरेंगसिया का युद्ध
1837 तक हो नेताओं ने गुप्त बैठकों के माध्यम से संगठित प्रतिरोध की तैयारी शुरू कर दी। ब्रिटिश प्रशासन भी इस प्रतिरोध को कुचलने के लिए सक्रिय था। नवंबर 1837 के अंत में लगभग 400 पैदल सैनिक, 60 घुड़सवार और दो तोपों के साथ एक बड़ी ब्रिटिश टुकड़ी हो गाँवों की ओर बढ़ी, जिसे सरायकेला के स्थानीय शासक के 200 सैनिकों का समर्थन प्राप्त था।
सेरेंगसिया घाटी, जो एक संकीर्ण मार्ग थी, युद्ध का स्थल बनी। हो योद्धाओं ने घाटी के फर्श पर अवरोध खड़े किए, ढलानों पर मोर्चा संभाला और धनुष-बाण जैसे पारंपरिक हथियारों से हमला किया। ब्रिटिश घुड़सवार असमतल रास्ते में फँस गए। दोनों ओर से अचानक हुए हमलों, जलते गोबर-राख-मिर्च मिश्रण और मधुमक्खियों के झुंडों ने ब्रिटिश सेना में अफरा-तफरी मचा दी। अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा।
सरकारी शहीद स्मारक के शिलालेख के अनुसार, इस युद्ध में 100 से अधिक ब्रिटिश सैनिक और लगभग 26 आदिवासी योद्धा मारे गए।
विजय के बाद प्रतिशोध
यह विजय अल्पकालिक सिद्ध हुई। ब्रिटिश सेनाओं ने राजाबासा और आसपास के गाँवों पर प्रतिशोधी हमले किए, बस्तियाँ जलाईं और ग्रामीणों को गिरफ्तार किया। 8 दिसंबर 1837 तक सभी प्रमुख हो नेता पकड़े गए और जगन्नाथपुर लाकर मृत्यु-दंड सुनाया गया।
1 जनवरी 1838 को पोटो हो, नर्रा हो और बेराई हो को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई। अगले दिन बोरा हो और पांडुआ हो को सेरेंगसिया गाँव के निकट फाँसी दी गई। इसके अतिरिक्त 79 अन्य हो योद्धाओं को विभिन्न आरोपों में कारावास हुआ।
स्मरण की तिथि पर विवाद
आज इस ऐतिहासिक संघर्ष का स्मरण 2 फरवरी को किया जाता है, लेकिन पश्चिमी सिंहभूम के आदिवासी कार्यकर्ता और शोधकर्ता इसे ऐतिहासिक रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार 1 और 2 जनवरी 1838 वे दिन हैं जब हो नेताओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, और यही कोल्हान प्रतिरोध की पराकाष्ठा थी। फरवरी में स्मरण करने से यह घटना अपने ऐतिहासिक संदर्भ से कट जाती है और केवल एक औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह जाती है।
समुदाय के लिए सटीक स्मृति का महत्व
हो समुदाय के लिए यह प्रश्न केवल स्मरण का नहीं, बल्कि सटीक और प्रमाणित स्मरण का है। लिखित अभिलेखों और पीढ़ीगत स्मृति में दर्ज इस संघर्ष को सही तिथि और संदर्भ में याद करना उनकी पहचान, इतिहास और आत्मसम्मान से जुड़ा है। सेरेंगसिया का युद्ध केवल एक सैन्य टकराव नहीं, बल्कि स्वायत्तता, भूमि और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का प्रतीक है, जिसे विस्मृति के अंधकार से बाहर लाना आवश्यक है।
Source: Indian Express