सर्वोच्च न्यायालय – नाबालिग की 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति

सर्वोच्च न्यायालय ने एक नाबालिग लड़की की 30 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी। यह निर्णय न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयाँ की पीठ द्वारा दिया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ को पूर्ण अवधि तक धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि महिला की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) एक मौलिक अधिकार है और इसे पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। पीठ ने यह दर्ज किया कि नाबालिग ने स्पष्ट और लगातार गर्भ जारी न रखने की इच्छा व्यक्त की है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि नाबालिग की गर्भावस्था स्वयं में एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है और ऐसे मामले में उसके हित सर्वोपरि हैं। न्यायालय ने यह भी इंगित किया कि 24 सप्ताह की वैधानिक सीमा पार होने के बाद कई महिलाएं सुरक्षित विकल्प न होने पर खतरनाक और जानलेवा अवैध उपायों (झोलाछाप/क्वैक) की ओर मजबूर हो सकती हैं।

ऐसी परिस्थितियाँ महिलाओं के जीवन और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं, जिसे न्यायिक हस्तक्षेप द्वारा रोका जाना आवश्यक है।यह निर्णय न केवल नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और स्वायत्तता को भी सुदृढ़ करता है।