वेनेज़ुएला पर दबाव की राजनीति और संसाधन नियंत्रण की नई साम्राज्यवादी रणनीति

वेनेज़ुएला में जो कुछ घटित हो रहा है, उसे केवल कूटनीति या सुरक्षा नीति के दायरे में रखना वास्तविकता को कम करके आंकना होगा। यह घटनाक्रम दरअसल खुला साम्राज्यवाद है, जहां अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक संप्रभु देश पर न केवल नौसैनिक नाकेबंदी थोपी, बल्कि उसके राजनीतिक नेतृत्व को अपहृत कराने जैसे कदमों के बाद यह घोषणा कर दी कि अब वाशिंगटन वेनेज़ुएला को “चलाएगा”। ट्रंप द्वारा विपक्ष के बजाय कार्यवाहक राष्ट्रपति Delcy Rodríguez का समर्थन करना इस हस्तक्षेप को कम गंभीर नहीं बनाता, बल्कि इसके वास्तविक उद्देश्य को उजागर करता है। यह न तो लोकतंत्र की रक्षा का प्रयास है और न ही मादक पदार्थों की तस्करी रोकने का अभियान, बल्कि वेनेज़ुएला के विशाल तेल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश है।

ऊपरी तौर पर ट्रंप प्रशासन की नीति विरोधाभासी लग सकती है, क्योंकि वह एक ओर बोलिवेरियन शासन को बनाए रखने की बात करता है और दूसरी ओर उसकी आर्थिक संप्रभुता को घोंट रहा है। लेकिन इसके पीछे एक ठंडी और गणनात्मक रणनीति काम कर रही है। अमेरिका इराक के अनुभव से यह सीख चुका है कि शासन को पूरी तरह गिराने से अराजकता और विद्रोह जन्म लेते हैं। इसलिए अब वह प्रत्यक्ष कब्ज़े या सत्ता परिवर्तन की लागत चुकाए बिना, मौजूदा राज्य तंत्र को ही अपने हितों के अनुरूप मोड़ना चाहता है। यह नव-उपनिवेशवाद का ऐसा रूप है, जिसमें राज्य की बाहरी संरचना बनी रहती है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण बाहर से संचालित होता है।

इस पूरी व्यवस्था ने डेल्सी रोड्रिगेज को एक बेहद कठिन स्थिति में ला खड़ा किया है। बोलिवेरियन आंदोलन की नींव ही अमेरिकी वर्चस्व और संसाधन लूट के विरोध पर टिकी रही है, लेकिन एक दशक से अधिक समय तक चले प्रतिबंधों ने वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था को इस कदर कमजोर कर दिया है कि मौजूदा सरकार को उसी शक्ति से बातचीत करनी पड़ रही है, जिसने उसके पूर्ववर्ती नेता का अपहरण कराया। उनका यह बयान कि “वाशिंगटन के आदेशों से अब बहुत हो चुका”, उस मानसिक और राजनीतिक दबाव को दर्शाता है, जिसके तहत उनकी सरकार काम कर रही है।

अमेरिका के दबाव में रोड्रिगेज सरकार ने तेल व्यापार से जुड़े कुछ नियमों में ढील दी है और राजनीतिक कैदियों को ‘शांति संकेत’ के रूप में रिहा भी किया है, लेकिन वे पूरी तरह राष्ट्रीय संप्रभुता नहीं सौंप सकतीं। ऐसा करना उनके राजनीतिक आधार, यानी चाविस्टा समर्थकों, को खोने के समान होगा। यहीं यह रणनीति अपने ही लक्ष्य के विरुद्ध काम करने लगती है। वाशिंगटन जितना अधिक दबाव काराकास पर डालेगा, उतना ही वह उस अस्थिरता को बढ़ाएगा, जिसे रोकने का वह दावा करता है।

यदि अमेरिका वास्तव में वेनेज़ुएला के साथ एक उत्पादक और संतुलित आर्थिक संबंध चाहता, तो उसे यह आक्रामक रास्ता नहीं अपनाना चाहिए था। जिन प्रतिबंधों ने वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था को तबाह किया, वे अमेरिकी नीतियों का परिणाम थे। जिस प्रवासन संकट का हवाला ट्रंप प्रशासन हस्तक्षेप के औचित्य के रूप में देता है, वह भी उन्हीं प्रतिबंधों की उपज है। अब वाशिंगटन उसी संकट को कम करने का प्रस्ताव रख रहा है, लेकिन शर्त यह है कि वेनेज़ुएला अपने संसाधनों पर अमेरिका के एकाधिकार को स्वीकार कर ले। यह कूटनीति नहीं, बल्कि सीधी जबरदस्ती और दबाव की राजनीति है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम को और भी खतरनाक बना देती है। जब रूस ने यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन किया, तो वैश्विक स्तर पर उसकी निंदा हुई और प्रतिबंध लगाए गए। यदि ट्रंप की यह तथाकथित ‘डॉनरो सिद्धांत’ बिना चुनौती के आगे बढ़ती रही, तो यह केवल वेनेज़ुएला के लिए नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक दक्षिण के लिए खतरे की घंटी होगी। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव समान संप्रभुता और नियम-आधारित व्यवस्था पर टिकी है। यदि संसाधनों के नाम पर ताकतवर देश कमजोर राष्ट्रों को इस तरह झुकाने लगें, तो कोई भी देश वास्तव में सुरक्षित नहीं रह सकता।

Source: The Hindu

Important Links

© Aura Study Academy 2025-26 |  All Copyright Reserved | Designed & Developed by Webguard