भारत में GDP आधार वर्ष संशोधन: 2011-12 से 2022-23

27 फरवरी को भारत राष्ट्रीय आय खातों की एक नई श्रृंखला जारी करने जा रहा है, जिसमें GDP का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया जाएगा। यह परिवर्तन केवल एक तकनीकी अभ्यास नहीं है, बल्कि इसका आर्थिक विमर्श, नीति-निर्माण और संघीय वित्तीय ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। अर्थव्यवस्था की संरचना में आए व्यापक बदलावों को सही ढंग से प्रतिबिंबित करने के लिए आधार वर्ष संशोधन आवश्यक माना जाता है।

GDP आधार वर्ष संशोधन का औचित्य

GDP का आधार वर्ष संशोधन अर्थव्यवस्था के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करता है। पुराना आधार वर्ष यह मानकर चलता है कि कृषि, विनिर्माण, सेवाओं और अन्य क्षेत्रों का आपसी योगदान समय के साथ अपरिवर्तित रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि पिछले एक दशक में तकनीक, उपभोग पैटर्न, डिजिटलीकरण और सेवा क्षेत्र के विस्तार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना को मूल रूप से बदल दिया है। ऐसे में पुराना आधार वर्ष वर्तमान आर्थिक यथार्थ को सही रूप में नहीं दर्शा सकता।

कार्यप्रणाली में प्रमुख सुधार

इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कार्यप्रणाली में किया गया सुधार है। नई श्रृंखला में प्रशासनिक और सर्वे-आधारित आंकड़ों का अधिक उपयोग किया गया है, जिससे पहले की तरह अनुमान आधारित प्रॉक्सी विधियों पर निर्भरता कम होगी। उदाहरण के लिए, श्रम बाजार की संरचना को समझने के लिए अब 2010-11 के पुराने रोजगार–बेरोजगार सर्वे के स्थान पर आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) का उपयोग किया जाएगा, जो वर्तमान श्रम परिस्थितियों को बेहतर दर्शाता है। इसी प्रकार, असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण के आंकड़ों से अनौपचारिक क्षेत्र के उत्पादन का अधिक सटीक आकलन संभव होगा।

उभरते क्षेत्रों का बेहतर समावेशन

नई कार्यप्रणाली के तहत डिजिटल सेवाओं, प्लेटफॉर्म-आधारित गतिविधियों और आधुनिक वित्तीय मध्यस्थता जैसे क्षेत्रों को अधिक प्रभावी ढंग से GDP में शामिल किया जाएगा। ये क्षेत्र या तो पहले मौजूद नहीं थे या फिर पुराने अनुमान तंत्र में अपर्याप्त रूप से दर्शाए गए थे। इससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक संरचना का अधिक यथार्थवादी चित्र सामने आएगा।

वास्तविक GDP की गणना में बदलाव

GDP संशोधन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू वास्तविक GDP की गणना से जुड़ा है। अब मूल्य अपस्फीतकों (deflators) के चयन में क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। पहले व्यापक रूप से थोक मूल्य सूचकांक (WPI) का उपयोग किया जाता था, जो मुख्यतः वस्तुओं के उत्पादक स्तर के मूल्यों को दर्शाता है और सेवाओं को पर्याप्त रूप से कवर नहीं करता। इससे सेवा क्षेत्र की वास्तविक वृद्धि का आकलन विकृत हो सकता था। नई व्यवस्था में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और जहाँ संभव हो, डबल डिफ्लेशन पद्धति का उपयोग किया जाएगा, जिससे मूल्य प्रभाव और वास्तविक वृद्धि के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा।

CPI संशोधन और उपभोग पैटर्न

हाल ही में 2022-23 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण पर आधारित CPI संशोधन से वर्तमान उपभोग संरचना बेहतर रूप में परिलक्षित होगी। इससे सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था में वास्तविक वृद्धि दर का आकलन अधिक विश्वसनीय होगा और नीति-निर्माताओं को सटीक संकेत प्राप्त होंगे।

राज्यों के लिए निहितार्थ: GSDP का महत्व

GDP संशोधन का प्रभाव केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा। भारत के संघीय वित्तीय ढांचे में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) राज्य बजट, उधारी सीमा और कर-वितरण का एक प्रमुख आधार है। पहले राज्य स्तरीय सकल मूल्य वर्धन (GVA) का आकलन मुख्यतः राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुपात विभाजन से किया जाता था, जो यह मानकर चलता था कि राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी समय के साथ स्थिर रहती है।

राज्य-विशिष्ट आंकड़ों का बढ़ता उपयोग

नई श्रृंखला में राज्य-विशिष्ट प्रशासनिक और सर्वे आंकड़ों का अधिक उपयोग किया जाएगा। GST रिकॉर्ड, उद्यम सर्वेक्षण और श्रम बाजार के आंकड़ों से राज्यों के उत्पादन का अधिक प्रत्यक्ष आकलन संभव होगा। इससे विशेषकर सेवा क्षेत्र, अनौपचारिक गतिविधियों और डिजिटल अर्थव्यवस्था में राज्यों के वास्तविक योगदान को बेहतर ढंग से मापा जा सकेगा।

वित्तीय उत्तरदायित्व और उधारी क्षमता

राज्यों के लिए यह संशोधन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) ढांचे के तहत घाटा और ऋण की सीमाएँ GSDP के अनुपात में तय होती हैं। यदि संशोधित GSDP ऊपर की ओर जाता है, तो बिना किसी वास्तविक वित्तीय सुधार के भी राज्यों की उधारी क्षमता बढ़ सकती है। इसके विपरीत, यदि GSDP में नीचे की ओर संशोधन होता है, तो राज्यों पर अधिक सख्त वित्तीय अनुशासन लागू हो सकता है।

कर-वितरण और वित्त आयोग

वित्त आयोग के कर-वितरण सूत्र में अब GSDP को 10 प्रतिशत भार दिया गया है। इससे आर्थिक आकार का महत्व बढ़ गया है। ऐसे में GSDP के संशोधित आंकड़े राज्यों को मिलने वाले केंद्रीय कर हिस्से को सीधे प्रभावित कर सकते हैं, भले ही वास्तविक आर्थिक गतिविधि में तत्काल कोई बदलाव न हुआ हो। यह संघीय वित्त व्यवस्था पर GDP मापन के प्रत्यक्ष प्रभाव को दर्शाता है।

निवेश, जोखिम आकलन और बाहरी दृष्टि

GDP और GSDP आंकड़े संप्रभु जोखिम, ऋण–GDP अनुपात और राजकोषीय घाटे के आकलन का आधार होते हैं। राज्य स्तर पर निवेशक GSDP वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय और क्षेत्रीय संरचना के आधार पर निवेश निर्णय लेते हैं। ऐसे में मापन पद्धति में बदलाव से राज्यों की सापेक्ष वित्तीय स्थिरता और निवेश आकर्षण प्रभावित हो सकता है।

सांख्यिकीय शासन का व्यापक संदर्भ

GDP संशोधन को एक बार का समायोजन नहीं, बल्कि सांख्यिकीय शासन को मजबूत करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका वास्तविक मूल्य इस बात में निहित है कि क्या यह नियमित, समयबद्ध और परिष्कृत संशोधनों की संस्कृति को बढ़ावा देता है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था विकसित होती है, मापन प्रणालियों का भी समानांतर विकास आवश्यक है।