भारत के पूर्वी तट पर ऊर्जा सहयोग का नया अध्याय: ONGC–रिलायंस की रणनीतिक साझेदारी

भारत के अपतटीय तेल और गैस क्षेत्र में सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सार्वजनिक क्षेत्र की Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) और निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Reliance Industries ने गहरे समुद्री संसाधनों को साझा करने के लिए एक रणनीतिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता India Energy Week 2026 के पहले दिन किया गया, जिसका उद्देश्य भारत के पूर्वी तट पर, विशेष रूप से Krishna Godavari Basin (KG बेसिन) और अंडमान अपतटीय क्षेत्र में, तेल और गैस की खोज एवं उत्पादन को अधिक कुशल और लागत प्रभावी बनाना है।

इस समझौते के तहत दोनों कंपनियां अपने अपतटीय परिचालनों से जुड़े प्रमुख संसाधनों को साझा करेंगी। इनमें ड्रिलिंग रिग, समुद्री पोत, पाइपलाइन, बिजली आपूर्ति, लॉगिंग और वेल सेवाएं, तथा ऑनशोर और ऑफशोर प्रोसेसिंग से जुड़ी सुविधाएं शामिल हैं। साझा संसाधनों के इस मॉडल से न केवल परिचालन लागत में कमी आएगी, बल्कि परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति भी तेज होगी और आपात परिस्थितियों में परिचालन लचीलापन बढ़ेगा।

ONGC के निदेशक (अन्वेषण) ओ.पी. सिन्हा ने स्पष्ट किया कि यह समझौता केवल KG बेसिन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य क्षेत्रों तक भी विस्तारित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस सहयोगी ढांचे का मूल विचार यह है कि यदि किसी कंपनी के पास कोई अवसंरचना या संसाधन अतिरिक्त है, तो उसे साझा करके दोनों पक्ष उसका बेहतर और अधिक लाभकारी उपयोग कर सकते हैं। इससे ऐसी स्थिति बनेगी, जहां दो या उससे अधिक कंपनियां एक ही बुनियादी ढांचे का संयुक्त रूप से इस्तेमाल कर सकेंगी।

यह सहयोग हाल ही में किए गए तेल क्षेत्र (विनियमन और विकास) अधिनियम में संशोधन के बाद संभव हो पाया है, जिसने अपतटीय और स्थलीय दोनों प्रकार की अवसंरचना और सुविधाओं को साझा करने के लिए कानूनी आधार प्रदान किया है। यह बदलाव भारत की ऊर्जा नीति में एक महत्वपूर्ण संकेत देता है, जहां प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि घरेलू तेल और गैस उत्पादन को बढ़ाया जा सके और आयात पर निर्भरता कम की जा सके।

कुल मिलाकर, ONGC और रिलायंस के बीच यह समझौता भारत के अपतटीय ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक व्यावहारिक और दूरदर्शी कदम है। संसाधनों के साझा उपयोग से जहां लागत और जोखिम घटेंगे, वहीं तकनीकी दक्षता और उत्पादन क्षमता में भी सुधार होगा। आने वाले समय में यदि इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों और परियोजनाओं तक विस्तार मिलता है, तो यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग आधारित विकास का एक नया मानक स्थापित कर सकता है।

Source: The Hindu

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