जीवन परिचय और निधन
प्रख्यात गांधीवादी, स्वतंत्रता सेनानी और श्रम आंदोलन के प्रमुख स्तंभ G. G. Parikh का 2 अक्टूबर 2025 को मुंबई में वृद्धावस्था के कारण निधन हो गया। वे 101 वर्ष के थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लोकतांत्रिक समाजवाद, श्रमिक सशक्तिकरण और युवाओं की भागीदारी के लिए समर्पित किया।
स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक योगदान
जी. जी. पारिख ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की थी, जिसके दौरान उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा 10 महीने तक कारावास झेलना पड़ा। बाद के वर्षों में वे आपातकाल के दौरान भी जेल गए। वे सेवा दल से जुड़े रहे और स्वतंत्रता के बाद समाजवादी विचारधारा के प्रसार में सक्रिय रहे। आपातकाल के बाद वे जनता पार्टी से भी जुड़े।
श्रम आंदोलन और सामाजिक कार्य
जी. जी. पारिख को श्रम आंदोलन के एक सशक्त निर्माता के रूप में जाना जाता है। वे हिंद मजदूर सभा से जुड़े रहे और श्रमिक अधिकारों के लिए निरंतर कार्य किया। उन्होंने उपभोक्ता सहकारी समितियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई, जिनमें अपना बाज़ार, गांवदेवी कंज़्यूमर सोसायटी और नान चौक कंज़्यूमर सोसायटी प्रमुख हैं।
यूसुफ मेहरअली केंद्र की स्थापना
उन्होंने महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के पनवेल तालुका के तारा गांव में यूसुफ मेहरअली केंद्र की स्थापना की। इस केंद्र का उद्देश्य युवाओं को जोड़कर स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण करना था। आज यह केंद्र 12 से अधिक राज्यों में सक्रिय है और ग्रामोद्योग, टिकाऊ आजीविका तथा स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दे रहा है।
ग्रामीण विकास और ग्रामोद्योग
महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने ग्रामोद्योग और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा दिया। तारा गांव में जैविक साबुन, मिट्टी के बर्तन, बेकरी उत्पाद, बढ़ईगीरी, वर्मी-कम्पोस्टिंग और नर्सरी जैसे कार्य शुरू हुए। वहां विद्यालय, छात्रावास और एक अस्पताल की स्थापना भी की गई।
चिकित्सकीय सेवा
पेशे से चिकित्सक रहे जी. जी. पारिख ने दशकों तक गरीब और वंचित वर्ग को नाममात्र शुल्क पर चिकित्सा सेवाएं प्रदान कीं। उन्होंने 90 वर्ष की आयु के बाद भी चिकित्सा सेवा जारी रखी। मुंबई में उनका क्लिनिक लंबे समय तक संचालित रहा, जिसकी सेवाएं उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों तक भी विस्तारित कीं।
वैचारिक प्रतिबद्धता और पर्यावरण चेतना
वे आजीवन धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक समाजवाद और साम्प्रदायिक सद्भाव के पक्षधर रहे। 2005 में उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और युवाओं को जोड़ने के लिए भारत यात्रा की। हाल के वर्षों में वे शून्य-कार्बन आंदोलन से भी सक्रिय रूप से जुड़े और जलवायु परिवर्तन के प्रति जन-जागरूकता फैलाने पर बल दिया।
व्यक्तिगत जीवन और अंतिम इच्छा
जी. जी. पारिख का जन्म 30 दिसंबर 1924 को राजकोट में हुआ था। 1948 में उन्होंने मंगला पारिख से विवाह किया। वे अपनी बेटी, एक पोते और एक भाभी को छोड़ गए हैं। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उनका पार्थिव शरीर मुंबई के जे. जे. अस्पताल को दान कर दिया गया।
यह लेख शैक्षणिक एवं सामान्य सूचना के उद्देश्य से, विषयगत जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।