ग्रीन कंसेंट (Green Consent) के लिए सिंगल आवेदन व्यवस्था : पर्यावरणीय शासन और औद्योगिक सुगमता

भारत में औद्योगिक इकाइयों को संचालन हेतु वायु अधिनियम, जल अधिनियम और विभिन्न अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अंतर्गत अलग-अलग मंज़ूरियाँ लेनी पड़ती थीं।
इससे:

  • प्रक्रिया जटिल थी

  • समय अधिक लगता था

  • उद्योगों पर अनुपालन (Compliance) का बोझ बढ़ता था

इसी संदर्भ में पर्यावरण मंत्रालय ने संयुक्त (Integrated) ग्रीन कंसेंट की व्यवस्था लागू की है।

 मुख्य प्रावधान (Key Features)

  1. सिंगल आवेदन प्रणाली

    • Air Act, Water Act और Waste Management Rules के लिए एक ही आवेदन।

  2. Consent to Operate की वैधता

    • अब अनुमति रद्द होने तक वैध रहेगी।

    • बार-बार नवीनीकरण की अनिवार्यता समाप्त।

  3. नियमित निरीक्षण जारी

    • पर्यावरणीय अनुपालन की जाँच Periodic Inspections से होगी।

    • उल्लंघन पर अनुमति रद्द की जा सकेगी।

  4. रेड कैटेगरी उद्योगों के लिए सुधार

    • प्रोसेसिंग समय 120 दिन से घटाकर 90 दिन

  5. पंजीकृत पर्यावरण ऑडिटर की भूमिका

    • Environment Audit Rules, 2025 के तहत प्रमाणित ऑडिटर साइट निरीक्षण कर सकेंगे।

  6. MSME के लिए विशेष छूट

    • अधिसूचित औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित सूक्ष्म व लघु इकाइयों को
      Self-Certification पर Consent to Establish

 सकारात्मक प्रभाव (Advantages)

1. ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार

  • कागजी प्रक्रिया कम

  • मंज़ूरी में देरी घटेगी

  • औद्योगिक संचालन में निरंतरता

2. प्रशासनिक दक्षता

  • SPCBs/PCCs उच्च-जोखिम उद्योगों पर अधिक ध्यान दे सकेंगे

  • संसाधनों का बेहतर उपयोग

3. पर्यावरणीय शासन में संतुलन

  • मंज़ूरी सरल, लेकिन

  • निगरानी और दंडात्मक शक्तियाँ बनी रहेंगी

4. MSME को बढ़ावा

  • छोटे उद्योगों को प्रारंभिक बाधाओं से राहत

  • औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहन

चिंताएँ और आलोचनात्मक बिंदु (Concerns)

  1. Self-Certification का दुरुपयोग

    • कमजोर निगरानी से पर्यावरणीय उल्लंघन का जोखिम।

  2. निजी ऑडिटरों की निष्पक्षता

    • हितों के टकराव (Conflict of Interest) की संभावना।

  3. Consent to Operate की अनिश्चित अवधि

    • लंबे समय तक संचालन से पर्यावरणीय प्रभाव बढ़ सकता है यदि निरीक्षण कमजोर रहे।

  4. राज्य बोर्डों की क्षमता

    • SPCBs की मानव-संसाधन व तकनीकी क्षमता सीमित है।

आगे का रास्ता (Way Forward)

  • डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग

  • ऑडिटरों के लिए कठोर जवाबदेही तंत्र

  • उच्च-प्रदूषण उद्योगों के लिए फ्रिक्वेंट इंस्पेक्शन

  • पर्यावरणीय डेटा को पब्लिक डोमेन में लाना (Transparency)

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