ई-LCV परिवर्तन की चिंगारी: ईंधन दक्षता मानक और भारत की स्वच्छ परिवहन चुनौती

जब भी कोई ऑनलाइन ऑर्डर आपके घर तक पहुंचता है, तो बहुत संभव है कि वह एक लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) के जरिए आया हो। ये छोटे, 3.5 टन से कम भार वाले वाहन आज भारत की तेजी से बढ़ती ई-कॉमर्स अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। इसके बावजूद एक अहम सच्चाई यह है कि जहां यात्री कारों के लिए वर्षों से ईंधन दक्षता और कार्बन उत्सर्जन के सख्त मानक लागू हैं, वहीं LCV लंबे समय तक नियामकीय दायरे से बाहर रहे हैं। यह तब है जब इन वाहनों का उपयोग बहुत अधिक होता है और इनकी बाजार हिस्सेदारी भी काफी बड़ी है।

अब जाकर इस खालीपन को भरने की कोशिश शुरू हुई है। जुलाई 2025 के अंत में ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा LCV के लिए ईंधन खपत मानकों का प्रस्ताव पेश किया गया, जो 2027 से 2032 तक लागू रहेगा। यह कदम भारत की परिवहन क्षेत्र में डी-कार्बोनाइजेशन की दिशा में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। हालांकि मसौदा जारी होने से पहले वाहन निर्माताओं ने यह कहते हुए LCV को इन मानकों से पूरी तरह छूट देने की मांग की थी कि यह बाजार बेहद मूल्य-संवेदनशील है और नए मानकों से आंतरिक दहन इंजन वाहनों में महंगी तकनीकों की जरूरत पड़ेगी। सरकार द्वारा इस मांग को खारिज करना यह संकेत देता है कि जलवायु लक्ष्यों को अब पीछे नहीं रखा जाएगा।

भारत में 2024 में कुल मालवाहक वाहनों में LCV की हिस्सेदारी लगभग 48 प्रतिशत थी, लेकिन इनका विद्युतीकरण केवल 2 प्रतिशत तक सीमित रहा। यही कारण है कि इस क्षेत्र को नियामकीय निगरानी में लाना स्वच्छ परिवहन एजेंडा के लिए बेहद जरूरी है। 2024 में भारत के LCV बेड़े से औसतन 147.5 ग्राम CO₂ प्रति किलोमीटर उत्सर्जन हुआ। यदि बैटरी इलेक्ट्रिक LCV की यह मामूली 2 प्रतिशत हिस्सेदारी भी न होती, तो उत्सर्जन 150 ग्राम प्रति किलोमीटर तक पहुंच जाता। इससे साफ होता है कि सीमित विद्युतीकरण भी उत्सर्जन घटाने में असर दिखा सकता है।

वर्तमान स्थिति यह है कि वाहन निर्माता इलेक्ट्रिक LCV बाजार में बहुत सतर्कता के साथ कदम रख रहे हैं। कुछ ही मॉडल उपलब्ध हैं, जिनमें आमतौर पर 35 kWh से कम की बैटरी होती है और अधिकतम रेंज करीब 150 किलोमीटर तक सीमित रहती है। इसकी वजह बाजार की कठोर वास्तविकताएं हैं — ऊंची शुरुआती कीमतें और विकल्पों की कमी। हालांकि कुल स्वामित्व लागत के लिहाज से इलेक्ट्रिक LCV पारंपरिक वाहनों से सस्ते पड़ सकते हैं, लेकिन खरीद के समय मिलने वाले प्रोत्साहनों में राज्यों के बीच असमानता मांग को कमजोर कर देती है। उदाहरण के तौर पर केंद्र की PM E-DRIVE योजना में LCV को शामिल नहीं किया गया है, जबकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्य शुरुआती लागत की बाधा को कम करने के लिए सहायता देते हैं।

अक्सर यह गलतफहमी रहती है कि ईंधन दक्षता मानक अपने आप विद्युतीकरण को बढ़ा देंगे। सच्चाई यह है कि ऐसा तभी होता है जब मानक पर्याप्त सख्त हों। यदि मानक ढीले हों, तो कंपनियों के लिए मौजूदा पेट्रोल-डीज़ल वाहनों में मामूली तकनीकी सुधार करना ही सस्ता विकल्प बन जाता है। यात्री कारों का अनुभव इसका उदाहरण है, जहां आठ साल से CAFE मानक लागू होने के बावजूद इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी सिर्फ 3 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई है।

यहां गणित अहम भूमिका निभाता है। अंतरराष्ट्रीय शोध के अनुसार 116.5 ग्राम CO₂ प्रति किलोमीटर वह सीमा है, जिसके बाद उत्सर्जन घटाने के लिए इलेक्ट्रिक LCV अपनाना, केवल इंजन सुधारों की तुलना में सस्ता पड़ने लगता है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा प्रस्तावित 115 ग्राम CO₂ प्रति किलोमीटर का मानक इस सीमा से थोड़ा आगे जरूर है, लेकिन इतना कड़ा नहीं कि बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण को मजबूर कर सके। समस्या यह भी है कि पारंपरिक LCV की कीमत जहां 10 लाख रुपये से कम रहती है, वहीं इलेक्ट्रिक विकल्प आमतौर पर इससे महंगे होते हैं। जब तक मांग नहीं बढ़ेगी, उत्पादन का पैमाना नहीं बढ़ेगा और कीमतें भी नीचे नहीं आएंगी — यह एक स्पष्ट ‘मुर्गी-अंडा’ जैसी स्थिति है।

दुनिया के कई हिस्सों में इस चुनौती से निपटने के लिए सुपर क्रेडिट जैसे उपाय अपनाए गए हैं, जहां एक इलेक्ट्रिक वाहन को नियामकीय गणना में कई गुना गिना जाता है। इससे कागजों पर भी विद्युतीकरण कंपनियों के लिए ज्यादा आकर्षक बन जाता है। भारत के प्रस्ताव में भी इलेक्ट्रिक LCV को शून्य CO₂ उत्सर्जन मानते हुए सुपर क्रेडिट दिए गए हैं, लेकिन साथ ही हाइब्रिड तकनीकों और कुछ चुनिंदा आंतरिक दहन इंजन सुधारों को भी रियायतें दी गई हैं। इससे खतरा यह है कि कंपनियां असली विद्युतीकरण की बजाय बीच के रास्तों पर ही टिके रहें।

आगे का रास्ता यही है कि भारत अपने पास मौजूद सभी औजारों को सही ढंग से जोड़े। सख्त मानक, सोच-समझकर दिए गए प्रोत्साहन और समय पर लागू की गई नीतियां मिलकर ही LCV क्षेत्र में वास्तविक बदलाव ला सकती हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यात्री कारों की तरह यहां भी ढीले मानकों और लगातार रियायतों के कारण विद्युतीकरण सीमित रह जाएगा। LCV भारत की स्वच्छ परिवहन यात्रा की चिंगारी बन सकते हैं, बशर्ते नीति उन्हें सही दिशा में धकेलने का साहस दिखाए।

Source: The Hindu

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