आधार को मतदाता पहचान सत्यापन से बाहर करने की मांग पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने एक अहम और व्यावहारिक टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि यदि जालसाजी की आशंका के आधार पर आधार को अविश्वसनीय ठहराया जाता है, तो यही तर्क पासपोर्ट जैसे दस्तावेज़ों पर भी लागू होगा। अदालत का यह अवलोकन उस याचिका के संदर्भ में आया, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि आधार निजी एजेंसियों के माध्यम से बनाया जाता है और इसे आसानी से फर्जी बनाया जा सकता है, इसलिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता पहचान सत्यापन के लिए इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ में शामिल न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पासपोर्ट भी सरकार के संरक्षण में निजी एजेंसियों के जरिए जारी किया जाता है। आधार नामांकन और अपडेट करने वाले निजी सेवा केंद्र भी किसी निजी हैसियत में नहीं, बल्कि वैधानिक ढांचे के तहत सार्वजनिक दायित्व निभाते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार एक सार्वजनिक दस्तावेज़ है और सच्चाई यह है कि कोई भी दस्तावेज़ — चाहे वह आधार हो या पासपोर्ट — फर्जी बनाया जा सकता है। केवल जालसाजी की संभावना के आधार पर किसी दस्तावेज़ को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
यह बहस उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब यह ध्यान में रखा जाए कि Election Commission of India ने जून 2025 में SIR प्रक्रिया के लिए 11 दस्तावेज़ों की सूची जारी की थी, जिसमें पासपोर्ट शामिल था। बाद में सितंबर 2025 में अदालत के एक आदेश के तहत आधार को 12वें ‘संकेतक दस्तावेज़’ के रूप में जोड़ा गया, खासकर बिहार में हुए SIR अभ्यास के दौरान। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने दलील दी कि आधार को नागरिकता या मताधिकार की पुष्टि के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि आधार अधिनियम 2016 स्वयं इसे नागरिकता का प्रमाण मानने से रोकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी बताया कि देशभर में लगभग 5.72 लाख निजी कॉमन सर्विस सेंटर आधार नामांकन और अपडेट का काम करते हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत न्यूनतम योग्यता के साथ संचालित किया जा सकता है। उन्होंने आधार अधिनियम की धारा 2(v) और धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि आधार का उद्देश्य केवल सब्सिडी और सेवाओं की लक्षित डिलीवरी है, न कि नागरिकता या अधिवास का प्रमाण देना। चूंकि आधार विदेशी नागरिकों को भी मिल सकता है, जिन्होंने भारत में 182 दिन पूरे किए हों, इसलिए इसे नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता।
इस पर न्यायमूर्ति बगची ने स्पष्ट किया कि अदालत या चुनाव आयोग ने कभी यह दावा नहीं किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण है। अदालत का रुख केवल इतना है कि आधार एक मान्य पहचान दस्तावेज़ है, जिसका उपयोग पहचान सत्यापन के लिए किया जा सकता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की संशोधित धारा 23 के तहत कोई भी व्यक्ति मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने या सत्यापन के लिए अपना आधार नंबर दे सकता है।
याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इस मौके पर “नियमित विशेष गहन पुनरीक्षण” की मांग उठाई और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक पवित्रता से जोड़ा। उनका तर्क था कि अवैध घुसपैठ एक तरह की बाहरी आक्रामकता बन चुकी है और केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। इसलिए मतदाता सूचियों की समय-समय पर सख्त जांच जरूरी है, ताकि चुनाव वास्तव में भारतीय नागरिकों की इच्छा को प्रतिबिंबित कर सकें।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस बहस को एक संतुलित दिशा देती है। अदालत ने यह स्वीकार किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि पहचान सत्यापन के लिए इसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि इसके दुरुपयोग की संभावना है। यह मामला न केवल आधार की वैधानिक भूमिका पर, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी गहरे सवाल उठाता है।
Source: The Hindu