अरावली पर्वतमाला: पारिस्थितिकी संरक्षण और सतत खनन ढांचा

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित नीति

नवंबर–दिसंबर 2025 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2024 और अगस्त 2025 के अपने आदेशों के तहत गठित समिति की सिफारिशों पर विचार किया। उद्देश्य था अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों (Ranges) की एकरूप, नीति-स्तरीय परिभाषा तय करना—विशेष रूप से खनन विनियमन के लिए। समिति का नेतृत्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने किया, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन विभागों के सचिव तथा तकनीकी संस्थान शामिल थे। न्यायालय ने अरावली की भूमिका को मरुस्थलीकरण रोकने, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

अरावली का महत्व

अरावली भारत की सबसे प्राचीन भू-आकृतिक संरचनाओं में से है, जो दिल्ली से हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक फैली है और 37 जिलों को कवर करती है। यहां अनियंत्रित खनन को न्यायालय ने राष्ट्रीय पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा बताया और एकरूप सुरक्षा मानकों की आवश्यकता पर बल दिया।

समिति के निष्कर्ष और सहमति

  • एकरूप मानदंड: स्थानीय राहत (local relief) से ≥100 मीटर ऊंचे भू-आकृतियों को अरावली पहाड़ियां माना जाएगा (राजस्थान में 2006 से लागू मानक)।

  • रेंज संरक्षण: 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक पहाड़ियां मिलकर अरावली रेंज बनाती हैं—बीच की घाटियां और ढलान भी संरक्षित।

  • खनन अपवर्जन: योग्य पहाड़ियों के न्यूनतम समोच्च (lowest contour) के भीतर तथा 500 मीटर रेंज-ज़ोन में नए खनन पट्टे नहीं।

  • पारदर्शिता: सर्वे ऑफ इंडिया मानचित्रों पर अनिवार्य अंकन; कोर/इनवायलेट क्षेत्रों की पहचान; अवैध खनन रोकथाम और सतत खनन के दिशानिर्देश।

सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति और निर्देश

20.11.2025 के निर्णय में न्यायालय ने सिफारिशें स्वीकार कीं और निर्देश दिए:

  • नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक, जब तक ICFRE द्वारा सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार न हो।

  • कोर/इनवायलेट क्षेत्रों में पूर्ण प्रतिबंध, केवल महत्वपूर्ण, रणनीतिक और परमाणु खनिजों के लिए सीमित अपवाद (MMDR अधिनियम के अनुसार)।

  • मौजूदा खदानों का संचालन केवल सख्त अनुपालन और सतत खनन शर्तों के तहत।

परिचालन परिभाषाएँ (संक्षेप)

  • अरावली पहाड़ियां: अरावली जिलों में स्थानीय राहत से ≥100 मीटर ऊंची कोई भी भू-आकृति—सम्पूर्ण संलग्न भूभाग, सहायक ढलान और संबद्ध विशेषताएं शामिल।

  • अरावली रेंज: 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक अरावली पहाड़ियां—बीच का पूरा क्षेत्र और संबद्ध भू-आकृतियां शामिल।

पारिस्थितिकी कैसे सुरक्षित रहती है

  • लैंडस्केप-स्तरीय संरक्षण: पूरी अरावली को सतत भू-रिज के रूप में संरक्षण, विखंडन से बचाव।

  • कोर क्षेत्र सुरक्षा: संरक्षित क्षेत्र, टाइगर रिज़र्व, ईको-सेंसिटिव ज़ोन, आर्द्रभूमि (रैमसर बफ़र सहित) और CAMPA रोपण क्षेत्र इनवायलेट।

  • प्रवर्तन: मानचित्र-आधारित सीमाएं, ड्रोन/सीसीटीवी निगरानी, वेब्रिज, जिला टास्क फोर्स और कड़े दंड।

  • सतत खनन नियंत्रण: कड़े EC/FC, समेकित प्रभाव आकलन, भूजल सुरक्षा, ऑडिट और खनन पश्चात पुनर्स्थापन।

यह लेख शैक्षणिक एवं सामान्य सूचना के उद्देश्य से, विषयगत जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।